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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड – तुलसीदास


रामचरितमानस के सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड को शेयर कर रहे हैं। भगवान राम के सभी भक्त यहां से अपने आराध्य श्री राम भगवान के पावन चरित को पढ़ सकते हैं । सुन्दरकाण्ड सभी प्राणियों को सुख समृद्धि और आत्मिक शांति प्रदान करता है।


शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशंभुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदांतवेद्यं विभुम्‌।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्‌॥ 1॥

शांत, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणों से परे), निष्पाप, मोक्षरूप परमशांति देनेवाले, ब्रह्मा, शंभु और शेष से निरंतर सेवित, वेदांत के द्वारा जानने योग्य, सर्वव्यापक, देवताओं में सबसे बड़े, माया से मनुष्य रूप में दिखनेवाले, समस्त पापों को हरनेवाले, करुणा की खान, रघुकुल में श्रेष्ठ तथा राजाओं के शिरोमणि, राम कहलानेवाले जगदीश्वर की मैं वंदना करता हूँ॥ 1॥

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥ 2॥

हे रघुनाथ! मैं सत्य कहता हूँ और फिर आप सबके अंतरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं) कि मेरे हृदय में दूसरी कोई इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति दीजिए और मेरे मन को काम आदि दोषों से रहित कीजिए॥ 2॥

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्‌।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥ 3॥

अतुल बल के धाम, सोने के पर्वत (सुमेरु) के समान कांतियुक्त शरीरवाले, दैत्यरूपी वन (को ध्वंस करने) के लिए अग्नि रूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, संपूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, रघुनाथ के प्रिय भक्त पवनपुत्र हनुमान को मैं प्रणाम करता हूँ॥ 3॥

जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥

जाम्बवान के सुंदर वचन हनुमान के हृदय को बहुत ही भाए। (वे बोले -) हे भाई! तुम लोग दुःख सहकर, कंद-मूल-फल खाकर तब तक मेरी राह देखना –

जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा । चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥

जब तक मैं सीता को देखकर (लौट) न आऊँ। काम अवश्य होगा, क्योंकि मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है। यह कहकर और सबको मस्तक नवाकर तथा हृदय में रघुनाथ को धारण करके हनुमान हर्षित होकर चले।

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
बार-बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥

समुद्र के तीर पर एक सुंदर पर्वत था। हनुमान खेल से ही (अनायास ही) कूदकर उसके ऊपर जा चढ़े और बार-बार रघुवीर का स्मरण करके अत्यंत बलवान हनुमान उस पर से बड़े वेग से उछले।

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥

जिस पर्वत पर हनुमान पैर रखकर चले (जिस पर से वे उछले), वह तुरंत ही पाताल में धँस गया। जैसे रघुनाथ का अमोघ बाण चलता है, उसी तरह हनुमान चले।

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रम हारी॥

समुद्र ने उन्हें रघुनाथ का दूत समझकर मैनाक पर्वत से कहा कि हे मैनाक! तू इनकी थकावट दूर करनेवाला है (अर्थात अपने ऊपर इन्हें विश्राम दे)।

दो० – हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥ 1॥

हनुमान ने उसे हाथ से छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा – भाई! राम का काम किए बिना मुझे विश्राम कहाँ?॥ 1॥

जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥

देवताओं ने पवनपुत्र हनुमान को जाते हुए देखा। उनकी विशेष बल-बुद्धि को जानने के लिए उन्होंने सुरसा नामक सर्पों की माता को भेजा, उसने आकर हनुमान से यह बात कही –

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥

आज देवताओं ने मुझे भोजन दिया है। यह वचन सुनकर पवनकुमार हनुमान ने कहा – राम का कार्य करके मैं लौट आऊँ और सीता की खबर प्रभु को सुना दूँ,

तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥

तब मैं आकर तुम्हारे मुँह में घुस जाऊँगा (तुम मुझे खा लेना)। हे माता! मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दे। जब किसी भी उपाय से उसने जाने नहीं दिया, तब हनुमान ने कहा – तो फिर मुझे खा न ले।

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥

उसने योजनभर (चार कोस में) मुँह फैलाया। तब हनुमान ने अपने शरीर को उससे दूना बढ़ा लिया। उसने सोलह योजन का मुख किया। हनुमान तुरंत ही बत्तीस योजन के हो गए।

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥

जैसे-जैसे सुरसा मुख का विस्तार बढ़ाती थी, हनुमान उसका दूना रूप दिखलाते थे। उसने सौ योजन (चार सौ कोस का) मुख किया। तब हनुमान ने बहुत ही छोटा रूप धारण कर लिया।

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥

और उसके मुख में घुसकर (तुरंत) फिर बाहर निकल आए और उसे सिर नवाकर विदा माँगने लगे। (उसने कहा -) मैंने तुम्हारे बुद्धि-बल का भेद पा लिया, जिसके लिए देवताओं ने मुझे भेजा था।

दो० – राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥ 2॥

तुम राम का सब कार्य करोगे, क्योंकि तुम बल-बुद्धि के भंडार हो। यह आशीर्वाद देकर वह चली गई, तब हनुमान हर्षित होकर चले॥ 2॥

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥

समुद्र में एक राक्षसी रहती थी। वह माया करके आकाश में उड़ते हुए पक्षियों को पकड़ लेती थी। आकाश में जो जीव-जंतु उड़ा करते थे, वह जल में उनकी परछाईं देखकर,

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥

उस परछाईं को पकड़ लेती थी, जिससे वे उड़ नहीं सकते थे (और जल में गिर पड़ते थे) इस प्रकार वह सदा आकाश में उड़नेवाले जीवों को खाया करती थी। उसने वही छल हनुमान से भी किया। हनुमान ने तुरंत ही उसका कपट पहचान लिया।

ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥

पवनपुत्र धीरबुद्धि वीर हनुमान उसको मारकर समुद्र के पार गए। वहाँ जाकर उन्होंने वन की शोभा देखी। मधु (पुष्प रस) के लोभ से भौंरे गुंजार कर रहे थे।

नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥

अनेकों प्रकार के वृक्ष फल-फूल से शोभित हैं। पक्षी और पशुओं के समूह को देखकर तो वे मन में (बहुत ही) प्रसन्न हुए। सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमान भय त्यागकर उस पर दौड़कर जा चढ़े।

उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥

(शिव कहते हैं -) हे उमा! इसमें वानर हनुमान की कुछ बड़ाई नहीं है। यह प्रभु का प्रताप है, जो काल को भी खा जाता है। पर्वत पर चढ़कर उन्होंने लंका देखी। बहुत ही बड़ा किला है, कुछ कहा नहीं जाता।
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा॥

वह अत्यंत ऊँचा है, उसके चारों ओर समुद्र है। सोने के परकोटे (चारदीवारी) का परम प्रकाश हो रहा है।
छं० – कनक कोटि बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥

विचित्र मणियों से जड़ा हुआ सोने का परकोटा है, उसके अंदर बहुत-से सुंदर-सुंदर घर हैं। चौराहे, बाजार, सुंदर मार्ग और गलियाँ हैं; सुंदर नगर बहुत प्रकार से सजा हुआ है। हाथी, घोड़े, खच्चरों के समूह तथा पैदल और रथों के समूहों को कौन गिन सकता है! अनेक रूपों के राक्षसों के दल हैं, उनकी अत्यंत बलवती सेना वर्णन करते नहीं बनती।

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥

वन, बाग, उपवन (बगीचे), फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ और बावलियाँ सुशोभित हैं। मनुष्य, नाग, देवताओं और गंधर्वों की कन्याएँ अपने सौंदर्य से मुनियों के भी मन को मोहे लेती हैं। कहीं पर्वत के समान विशाल शरीरवाले बड़े ही बलवान मल्ल (पहलवान) गरज रहे हैं। वे अनेकों अखाड़ों में बहुत प्रकार से भिड़ते और एक-दूसरे को ललकारते हैं।

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥

भयंकर शरीरवाले करोड़ों योद्धा यत्न करके (बड़ी सावधानी से) नगर की चारों दिशाओं में (सब ओर से) रखवाली करते हैं। कहीं दुष्ट राक्षस भैंसों, मनुष्यों, गायों, गदहों और बकरों को खा रहे हैं। तुलसीदास ने इनकी कथा इसीलिए कुछ थोड़ी-सी कही है कि ये निश्चय ही राम के बाणरूपी तीर्थ में शरीरों को त्यागकर परमगति पाएँगे।
दो० – पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरों निसि नगर करौं पइसार॥ 3॥

नगर के बहुसंख्यक रखवालों को देखकर हनुमान ने मन में विचार किया कि अत्यंत छोटा रूप धरूँ और रात के समय नगर में प्रवेश करूँ॥ 3॥
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥

हनुमान मच्छर के समान (छोटा-सा) रूप धारण कर नर रूप से लीला करनेवाले भगवान राम का स्मरण करके लंका को चले। (लंका के द्वार पर) लंकिनी नाम की एक राक्षसी रहती थी। वह बोली – मेरा निरादर करके (बिना मुझसे पूछे) कहाँ चला जा रहा है?

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥

हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना? जहाँ तक (जितने) चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं। महाकपि हनुमान ने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खून की उल्टी करती हुई पृथ्वी पर ल़ुढक पड़ी।

पुनि संभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंच कहा मोहि चीन्हा॥

वह लंकिनी फिर अपने को सँभालकर उठी और डर के मारे हाथ जोड़कर विनती करने लगी। (वह बोली -) रावण को जब ब्रह्मा ने वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसों के विनाश की यह पहचान बता दी थी कि –

बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥

जब तू बंदर के मारने से व्याकुल हो जाए, तब तू राक्षसों का संहार हुआ जान लेना। हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैं राम के दूत (आप) को नेत्रों से देख पाई।

दो० – तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥ 4॥

हे तात! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाए, तो भी वे सब मिलकर (दूसरे पलड़े पर रखे हुए) उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो क्षण मात्र के सत्संग से होता है॥ 4॥

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥

अयोध्यापुरी के राजा रघुनाथ को हृदय में रखे हुए नगर में प्रवेश करके सब काम कीजिए। उसके लिए विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है, अग्नि में शीतलता आ जाती है।
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥

और हे गरुड़! सुमेरु पर्वत उसके लिए रज के समान हो जाता है, जिसे राम ने एक बार कृपा करके देख लिया। तब हनुमान ने बहुत ही छोटा रूप धारण किया और भगवान का स्मरण करके नगर में प्रवेश किया।

मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥

उन्होंने एक-एक (प्रत्येक) महल की खोज की। जहाँ-तहाँ असंख्य योद्धा देखे। फिर वे रावण के महल में गए। वह अत्यंत विचित्र था, जिसका वर्णन नहीं हो सकता।
सयन किएँ देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥

हनुमान ने उस (रावण) को सोया हुआ देखा; परंतु महल में जानकी नहीं दिखाई दीं। फिर एक सुंदर महल दिखाई दिया। वहाँ (उसमें) भगवान का एक अलग मंदिर बना हुआ था।

दो० – रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराई॥ 5॥

वह महल राम के आयुध (धनुष-बाण) के चिह्नों से अंकित था, उसकी शोभा वर्णन नहीं की जा सकती। वहाँ नवीन-नवीन तुलसी के वृक्ष-समूहों को देखकर कपिराज हनुमान हर्षित हुए॥ 5॥

लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
मन महुँ तरक करैं कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥

लंका तो राक्षसों के समूह का निवास स्थान है। यहाँ सज्जन (साधु पुरुष) का निवास कहाँ? हनुमान मन में इस प्रकार तर्क करने लगे। उसी समय विभीषण जागे।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन सठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥

उन्होंने (विभीषण ने) राम नाम का स्मरण (उच्चारण) किया। हनुमान ने उन्हें सज्जन जाना और हृदय से हर्षित हुए। (हनुमान ने विचार किया कि) इनसे हठ करके (अपनी ओर से ही) परिचय करूँगा, क्योंकि साधु से कार्य की हानि नहीं होती (प्रत्युत लाभ ही होता है)।

बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥

ब्राह्मण का रूप धरकर हनुमान ने उन्हें वचन सुनाए (पुकारा)। सुनते ही विभीषण उठकर वहाँ आए। प्रणाम करके कुशल पूछी (और कहा कि) हे ब्राह्मणदेव! अपनी कथा समझाकर कहिए।
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥

क्या आप हरिभक्तों में से कोई हैं? क्योंकि आपको देखकर मेरे हृदय में अत्यंत प्रेम उमड़ रहा है। अथवा क्या आप दीनों से प्रेम करनेवाले स्वयं राम ही हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने (घर-बैठे दर्शन देकर कृतार्थ करने) आए हैं?

दो० – तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥ 6॥

तब हनुमान ने राम की सारी कथा कहकर अपना नाम बताया। सुनते ही दोनों के शरीर पुलकित हो गए और राम के गुणसमूहों का स्मरण करके दोनों के मन (प्रेम और आनंद में) मग्न हो गए॥ 6॥

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥

(विभीषण ने कहा -) हे पवनपुत्र! मेरी रहनी सुनो। मैं यहाँ वैसे ही रहता हूँ जैसे दाँतों के बीच में बेचारी जीभ। हे तात! मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुल के नाथ राम क्या कभी मुझ पर कृपा करेंगे?
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीत न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥

मेरा तामसी (राक्षस) शरीर होने से साधन तो कुछ बनता नहीं और न मन में राम के चरणकमलों में प्रेम ही है। परंतु हे हनुमान! अब मुझे विश्वास हो गया कि राम की मुझ पर कृपा है; क्योंकि हरि की कृपा के बिना संत नहीं मिलते।

जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीति॥

जब रघुवीर ने कृपा की है, तभी तो आपने मुझे हठ करके (अपनी ओर से) दर्शन दिए हैं। (हनुमान ने कहा -) हे विभीषण! सुनिए, प्रभु की यही रीति है कि वे सेवक पर सदा ही प्रेम किया करते हैं।

कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥

भला कहिए, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? (जाति का) चंचल वानर हूँ और सब प्रकार से नीच हूँ। प्रातःकाल जो हम लोगों (बंदरों) का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन न मिले।

दो० – अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्हीं कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥ 7॥

हे सखा! सुनिए, मैं ऐसा अधम हूँ; पर राम ने तो मुझ पर भी कृपा ही की है। भगवान के गुणों का स्मरण करके हनुमान के दोनों नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया॥ 7॥
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥

जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी (रघुनाथ) को भुलाकर (विषयों के पीछे) भटकते फिरते हैं, वे दुःखी क्यों न हों? इस प्रकार राम के गुणसमूहों को कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय (परम) शांति प्राप्त की।
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥

फिर विभीषण ने, जानकी जिस प्रकार वहाँ (लंका में) रहती थीं, वह सब कथा कही। तब हनुमान ने कहा – हे भाई! सुनो, मैं जानकी माता को देखता चाहता हूँ।
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥

विभीषण ने (माता के दर्शन की) सब युक्तियाँ (उपाय) कह सुनाईं। तब हनुमान विदा लेकर चले। फिर वही (पहले का मसक-सरीखा) रूप धरकर वहाँ गए, जहाँ अशोक वन में (वन के जिस भाग में) सीता रहती थीं।

देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥

सीता को देखकर हनुमान ने उन्हें मन ही में प्रणाम किया। उन्हें बैठे-ही-बैठे रात्रि के चारों पहर बीत जाते हैं। शरीर दुबला हो गया है, सिर पर जटाओं की एक वेणी (लट) है। हृदय में रघुनाथ के गुणसमूहों का जाप (स्मरण) करती रहती हैं।

दो० – निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥ 8॥

जानकी नेत्रों को अपने चरणों में लगाए हुए हैं (नीचे की ओर देख रही हैं) और मन राम के चरण कमलों में लीन है। जानकी को दीन (दुःखी) देखकर पवनपुत्र हनुमान बहुत ही दुःखी हुए॥ 8॥
तरु पल्लव महँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥

हनुमान वृक्ष के पत्तों में छिपे रहे और विचार करने लगे कि हे भाई! क्या करूँ (इनका दुःख कैसे दूर करूँ)? उसी समय बहुत-सी स्त्रियों को साथ लिए सज-धजकर रावण वहाँ आया।

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥

उस दुष्ट ने सीता को बहुत प्रकार से समझाया। साम, दान, भय और भेद दिखलाया। रावण ने कहा – हे सुमुखि! हे सयानी! सुनो! मंदोदरी आदि सब रानियों को –
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥

मैं तुम्हारी दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है। तुम एक बार मेरी ओर देखो तो सही! अपने परम स्नेही कोसलाधीश राम का स्मरण करके जानकी तिनके की आड़ (परदा) करके कहने लगीं –

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥

हे दशमुख! सुन, जुगनू के प्रकाश से कभी कमलिनी खिल सकती है? जानकी फिर कहती हैं – तू (अपने लिए भी) ऐसा ही मन में समझ ले। रे दुष्ट! तुझे रघुवीर के बाण की खबर नहीं है।

सठ सूनें हरि आनेहि मोही। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥

रे पापी! तू मुझे सूने में हर लाया है। रे अधम! निर्लज्ज! तुझे लज्जा नहीं आती?

दो० – आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥ 9॥

अपने को जुगनू के समान और राम को सूर्य के समान सुनकर और सीता के कठोर वचनों को सुनकर रावण तलवार निकालकर बड़े गुस्से में आकर बोला – ॥ 9॥

सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी॥

सीता! तूने मेरा अपमान किया है। मैं तेरा सिर इस कठोर कृपाण से काट डालूँगा। नहीं तो (अब भी) जल्दी मेरी बात मान ले। हे सुमुखि! नहीं तो जीवन से हाथ धोना पड़ेगा।

स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥

(सीता ने कहा -) हे दशग्रीव! प्रभु की भुजा जो श्याम कमल की माला के समान सुंदर और हाथी की सूँड़ के समान (पुष्ट तथा विशाल) है, या तो वह भुजा ही मेरे कंठ में पड़ेगी या तेरी भयानक तलवार ही। रे शठ! सुन, यही मेरा सच्चा प्रण है।

चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा॥

सीता कहती हैं – हे चंद्रहास (तलवार)! रघुनाथ के विरह की अग्नि से उत्पन्न मेरी बड़ी भारी जलन को तू हर ले। हे तलवार! तू शीतल, तीव्र और श्रेष्ठ धारा बहाती है (अर्थात तेरी धारा ठंडी और तेज है), तू मेरे दुःख के बोझ को हर ले।

सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥

सीता के ये वचन सुनते ही वह मारने दौड़ा। तब मय दानव की पुत्री मंदोदरी ने नीति कहकर उसे समझाया। तब रावण ने सब दासियों को बुलाकर कहा कि जाकर सीता को बहुत प्रकार से भय दिखलाओ।
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥

यदि महीने भर में यह कहा न माने तो मैं इसे तलवार निकालकर मार डालूँगा।
दो० – भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥ 10॥

(यों कहकर) रावण घर चला गया। यहाँ राक्षसियों के समूह बहुत-से बुरे रूप धरकर सीता को भय दिखलाने लगे॥ 10॥

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥

उनमें एक त्रिजटा नाम की राक्षसी थी। उसकी राम के चरणों में प्रीति थी और वह विवेक (ज्ञान) में निपुण थी। उसने सबों को बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा – सीता की सेवा करके अपना कल्याण कर लो।

सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥

स्वप्न में (मैंने देखा कि) एक बंदर ने लंका जला दी। राक्षसों की सारी सेना मार डाली गई। रावण नंगा है और गदहे पर सवार है। उसके सिर मुँड़े हुए हैं, बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं।

एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥

इस प्रकार से वह दक्षिण (यमपुरी की) दिशा को जा रहा है और मानो लंका विभीषण ने पाई है। नगर में राम की दुहाई फिर गई। तब प्रभु ने सीता को बुला भेजा।

यह सपना मैं कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥
मैं पुकारकर (निश्चय के साथ) कहती हूँ कि यह स्वप्न चार (कुछ ही) दिनों बाद सत्य होकर रहेगा। उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गईं और जानकी के चरणों पर गिर पड़ीं।

 

दो० – जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥ 11॥

तब (इसके बाद) वे सब जहाँ-तहाँ चली गईं। सीता मन में सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जाने पर नीच राक्षस रावण मुझे मारेगा॥ 11॥

त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥

सीता हाथ जोड़कर त्रिजटा से बोलीं – हे माता! तू मेरी विपत्ति की संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूँ। विरह असह्य हो चला है, अब यह सहा नहीं जाता।

आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥

काठ लाकर चिता बनाकर सजा दे। हे माता! फिर उसमें आग लगा दे। हे सयानी! तू मेरी प्रीति को सत्य कर दे। रावण की शूल के समान दुःख देनेवाली वाणी कानों से कौन सुने?

सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥

सीता के वचन सुनकर त्रिजटा ने चरण पकड़कर उन्हें समझाया और प्रभु का प्रताप, बल और सुयश सुनाया। (उसने कहा -) हे सुकुमारी! सुनो, रात्रि के समय आग नहीं मिलेगी। ऐसा कहकर वह अपने घर चली गई।

कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा॥
सीता (मन-ही-मन) कहने लगीं – (क्या करूँ) विधाता ही विपरीत हो गया। न आग मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी। आकाश में अंगारे प्रकट दिखाई दे रहे हैं, पर पृथ्वी पर एक भी तारा नहीं आता।

पावकमय ससि स्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥

चंद्रमा अग्निमय है, किंतु वह भी मानो मुझे हतभागिनी जानकर आग नहीं बरसाता। हे अशोक वृक्ष! मेरी विनती सुन! मेरा शोक हर ले और अपना (अशोक) नाम सत्य कर।

नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥

तेरे नए-नए कोमल पत्ते अग्नि के समान हैं। अग्नि दे, विरह-रोग का अंत मत कर (अर्थात विरह-रोग को बढ़ाकर सीमा तक न पहुँचा)। सीता को विरह से परम व्याकुल देखकर वह क्षण हनुमान को कल्प के समान बीता।

दो० – कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥ 12॥

तब हनुमान ने हदय में विचार कर (सीता के सामने) अँगूठी डाल दी, मानो अशोक ने अंगारा दे दिया। (यह समझकर) सीता ने हर्षित होकर उठकर उसे हाथ में ले लिया॥ 12॥

तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥

तब उन्होंने राम-नाम से अंकित अत्यंत सुंदर एवं मनोहर अँगूठी देखी। अँगूठी को पहचानकर सीता आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषाद से हृदय में अकुला उठीं।

जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥

(वे सोचने लगीं -) रघुनाथ तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है? और माया से ऐसी (माया के उपादान से सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनाई नहीं जा सकती। सीता मन में अनेक प्रकार के विचार कर रही थीं। इसी समय हनुमान मधुर वचन बोले –

रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥

वे रामचंद्र के गुणों का वर्णन करने लगे, (जिनके) सुनते ही सीता का दुःख भाग गया। वे कान और मन लगाकर उन्हें सुनने लगीं। हनुमान ने आदि से लेकर अब तक की सारी कथा कह सुनाई।

श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कही सो प्रगट होति किन भाई॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥

(सीता बोलीं -) जिसने कानों के लिए अमृत रूप यह सुंदर कथा कही, वह हे भाई! प्रकट क्यों नहीं होता? तब हनुमान पास चले गए। उन्हें देखकर सीता फिरकर (मुख फेरकर) बैठ गईं; उनके मन में आश्चर्य हुआ।

राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥

(हनुमान ने कहा -) हे माता जानकी मैं राम का दूत हूँ। करुणानिधान की सच्ची शपथ करता हूँ। हे माता! यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ। राम ने मुझे आपके लिए यह सहिदानी (निशानी या पहचान) दी है।

नर बानरहि संग कहु कैसें। कही कथा भइ संगति जैसें॥

(सीता ने पूछा -) नर और वानर का संग कहो कैसे हुआ? तब हनुमान ने जैसे संग हुआ था, वह सब कथा कही।

दो० – कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥ 13॥

हनुमान के प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीता के मन में विश्वास उत्पन्न हो गया। उन्होंने जान लिया कि यह मन, वचन और कर्म से कृपासागर रघुनाथ का दास है॥ 13॥

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयहु तात मो कहुँ जलजाना॥

भगवान का जन (सेवक) जानकर अत्यंत गाढ़ी प्रीति हो गई। नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया और शरीर अत्यंत पुलकित हो गया (सीता ने कहा -) हे तात हनुमान! विरहसागर में डूबती हुई मेरे लिए तुम जहाज हुए।

अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी॥
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥

मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मण सहित खर के शत्रु सुखधाम प्रभु का कुशल-मंगल कहो। रघुनाथ तो कोमल हृदय और कृपालु हैं। फिर हे हनुमान! उन्होंने किस कारण यह निष्ठुरता धारण कर ली है?

सहज बानि सेवक सुखदायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥

सेवक को सुख देना उनकी स्वाभाविक बान है। वे रघुनाथ क्या कभी मेरी भी याद करते हैं? हे तात! क्या कभी उनके कोमल साँवले अंगों को देखकर मेरे नेत्र शीतल होंगे?

बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥

(मुँह से) वचन नहीं निकलता, नेत्रों में (विरह के आँसुओं का) जल भर आया। (बड़े दुःख से वे बोलीं -) हा नाथ! आपने मुझे बिलकुल ही भुला दिया! सीता को विरह से परम व्याकुल देखकर हनुमान कोमल और विनीत वचन बोले –

मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥
जनि जननी मानह जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥

हे माता! सुंदर कृपा के धाम प्रभु भाई लक्ष्मण सहित (शरीर से) कुशल हैं, परंतु आपके दुःख से दुःखी हैं। हे माता! मन में ग्लानि न मानिए (मन छोटा करके दुःख न कीजिए)। राम के हृदय में आपसे दूना प्रेम है।

दो० – रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥ 14॥

हे माता! अब धीरज धरकर रघुनाथ का संदेश सुनिए। ऐसा कहकर हनुमान प्रेम से गद्गद हो गए। उनके नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया॥ 14॥

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥

(हनुमान बोले -) राम ने कहा है कि हे सीते! तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गए हैं। वृक्षों के नए-नए कोमल पत्ते मानो अग्नि के समान, रात्रि कालरात्रि के समान, चंद्रमा सूर्य के समान।

कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥

और कमलों के वन भालों के वन के समान हो गए हैं। मेघ मानो खौलता हुआ तेल बरसाते हैं। जो हित करनेवाले थे, वे ही अब पीड़ा देने लगे हैं। त्रिविध (शीतल, मंद, सुगंध) वायु साँप के श्वास के समान (जहरीली और गरम) हो गई है।

कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥

मन का दुःख कह डालने से भी कुछ घट जाता है। पर कहूँ किससे? यह दुःख कोई जानता नहीं। हे प्रिये! मेरे और तेरे प्रेम का तत्व (रहस्य) एक मेरा मन ही जानता है।
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥

और वह मन सदा तेरे ही पास रहता है। बस, मेरे प्रेम का सार इतने में ही समझ ले। प्रभु का संदेश सुनते ही जानकी प्रेम में मग्न हो गईं। उन्हें शरीर की सुध न रही।

कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥

हनुमान ने कहा – हे माता! हृदय में धैर्य धारण करो और सेवकों को सुख देनेवाले राम का स्मरण करो। रघुनाथ की प्रभुता को हृदय में लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़ दो।

दो० – निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥ 15॥

राक्षसों के समूह पतंगों के समान और रघुनाथ के बाण अग्नि के समान हैं। हे माता! हृदय में धैर्य धारण करो और राक्षसों को जला ही समझो॥ 15॥

जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई॥
राम बान रबि उएँ जानकी। तम बरुथ कहँ जातुधान की॥

राम ने यदि खबर पाई होती तो वे विलंब न करते। हे जानकी! रामबाणरूपी सूर्य के उदय होने पर राक्षसों की सेनारूपी अंधकार कहाँ रह सकता है?

अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयुस नहिं राम दोहाई॥
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा॥

हे माता! मैं आपको अभी यहाँ से लिवा जाऊँ; पर राम की शपथ है, मुझे प्रभु (उन) की आज्ञा नहीं है। (अतः) हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। राम वानरों सहित यहाँ आएँगे

निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना॥

और राक्षसों को मारकर आपको ले जाएँगे। नारद आदि (ऋषि-मुनि) तीनों लोकों में उनका यश गाएँगे। (सीता ने कहा -) हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन्हे-नन्हे-से) होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान, योद्धा हैं।

मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥

अतः मेरे हृदय में बड़ा भारी संदेह होता है (कि तुम-जैसे बंदर राक्षसों को कैसे जीतेंगे)! यह सुनकर हनुमान ने अपना शरीर प्रकट किया। सोने के पर्वत (सुमेरु) के आकार का (अत्यंत विशाल) शरीर था, जो युद्ध में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करनेवाला, अत्यंत बलवान और वीर था।

सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥

तब (उसे देखकर) सीता के मन में विश्वास हुआ। हनुमान ने फिर छोटा रूप धारण कर लिया।

दो० – सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥ 16॥

हे माता! सुनो, वानरों में बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परंतु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है (अत्यंत निर्बल भी महान बलवान को मार सकता है)॥ 16॥

मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥

भक्ति, प्रताप, तेज और बल से सनी हुई हनुमान की वाणी सुनकर सीता के मन में संतोष हुआ। उन्होंने राम के प्रिय जानकर हनुमान को आशीर्वाद दिया कि हे तात! तुम बल और शील के निधान होओ।

अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥

हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित), अमर और गुणों के खजाने होओ। रघुनाथ तुम पर बहुत कृपा करें। ‘प्रभु कृपा करें’ ऐसा कानों से सुनते ही हनुमान पूर्ण प्रेम में मग्न हो गए।
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥

हनुमान ने बार-बार सीता के चरणों में सिर नवाया और फिर हाथ जोड़कर कहा – हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया। आपका आशीर्वाद अमोघ (अचूक) है, यह बात प्रसिद्ध है।

सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥

हे माता! सुनो, सुंदर फलवाले वृक्षों को देखकर मुझे बड़ी ही भूख लग आई है। (सीता ने कहा -) हे बेटा! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वन की रखवाली करते हैं।

तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं।
जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥

(हनुमान ने कहा -) हे माता! यदि आप मन में सुख मानें (प्रसन्न होकर) आज्ञा दें) तो मुझे उनका भय तो बिलकुल नहीं है।

दो० – देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥ 17॥

हनुमान को बुद्धि और बल में निपुण देखकर जानकी ने कहा – जाओ। हे तात! रघुनाथ के चरणों को हृदय में धारण करके मीठे फल खाओ॥ 17॥

चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥

वे सीता को सिर नवाकर चले और बाग में घुस गए। फल खाए और वृक्षों को तोड़ने लगे। वहाँ बहुत-से योद्धा रखवाले थे। उनमें से कुछ को मार डाला और कुछ ने जाकर रावण से पुकार की –

नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥

(और कहा -) हे नाथ! एक बड़ा भारी बंदर आया है। उसने अशोक वाटिका उजाड़ डाली। फल खाए, वृक्षों को उखाड़ डाला और रखवालों को मसल-मसलकर जमीन पर डाल दिया।

सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे॥

यह सुनकर रावण ने बहुत-से योद्धा भेजे। उन्हें देखकर हनुमान ने गर्जना की। हनुमान ने सब राक्षसों को मार डाला, कुछ जो अधमरे थे, चिल्लाते हुए गए।

पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥

फिर रावण ने अक्षय कुमार को भेजा। वह असंख्य श्रेष्ठ योद्धाओं को साथ लेकर चला। उसे आते देखकर हनुमान ने एक वृक्ष (हाथ में) लेकर ललकारा और उसे मारकर महाध्वनि (बड़े जोर) से गर्जना की।

दो० – कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥ 18॥

उन्होंने सेना में से कुछ को मार डाला और कुछ को मसल डाला और कुछ को पकड़-पकड़कर धूल में मिला दिया। कुछ ने फिर जाकर पुकार की कि हे प्रभु! बंदर बहुत ही बलवान है॥ 18॥

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥

पुत्र का वध सुनकर रावण क्रोधित हो उठा और उसने (अपने जेठे पुत्र) बलवान मेघनाद को भेजा। (उससे कहा कि -) हे पुत्र! मारना नहीं; उसे बाँध लाना। उस बंदर को देखा जाए कि कहाँ का है।

चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥

इंद्र को जीतनेवाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला। भाई का मारा जाना सुन उसे क्रोध हो आया। हनुमान ने देखा कि अबकी भयानक योद्धा आया है। तब वे कटकटाकर गरजे और दौड़े।

अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दई निज अंगा॥

उन्होंने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और (उसके प्रहार से) लंकेश्वर रावण के पुत्र मेघनाद को बिना रथ का कर दिया (रथ को तोड़कर उसे नीचे पटक दिया)। उसके साथ जो बड़े-बड़े योद्धा थे, उनको पकड़-पकड़कर हनुमान अपने शरीर से मसलने लगे।

तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥

उन सबको मारकर फिर मेघनाद से लड़ने लगे। (लड़ते हुए वे ऐसे मालूम होते थे) मानो दो गजराज (श्रेष्ठ हाथी) भिड़ गए हों। हनुमान उसे एक घूँसा मारकर वृक्ष पर जा चढ़े। उसको क्षणभर के लिए मूर्च्छा आ गई।

उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥

फिर उठकर उसने बहुत माया रची; परंतु पवन के पुत्र उससे जीते नहीं जाते।

दो० – ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥ 19॥

अंत में उसने ब्रह्मास्त्र का संधान (प्रयोग) किया, तब हनुमान ने मन में विचार किया कि यदि ब्रह्मास्त्र को नहीं मानता हूँ तो उसकी अपार महिमा मिट जाएगी॥ 19॥

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा॥
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥

उसने हनुमान को ब्रह्मबाण मारा, (जिसके लगते ही वे वृक्ष से नीचे गिर पड़े) परंतु गिरते समय भी उन्होंने बहुत-सी सेना मार डाली। जब उसने देखा कि हनुमान मूर्छित हो गए हैं, तब वह उनको नागपाश से बाँधकर ले गया।

जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥

(शिव कहते हैं -) हे भवानी! सुनो, जिनका नाम जपकर ज्ञानी (विवेकी) मनुष्य संसार (जन्म-मरण) के बंधन को काट डालते हैं, उनका दूत कहीं बंधन में आ सकता है? किंतु प्रभु के कार्य के लिए हनुमान ने स्वयं अपने को बँधवा लिया।

कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥

बंदर का बाँधा जाना सुनकर राक्षस दौड़े और कौतुक के लिए (तमाशा देखने के लिए) सब सभा में आए। हनुमान ने जाकर रावण की सभा देखी। उसकी अत्यंत प्रभुता (ऐश्वर्य) कुछ कही नहीं जाती।

कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥

देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नम्रता के साथ भयभीत हुए सब रावण की भौं ताक रहे हैं। (उसका रुख देख रहे हैं।) उसका ऐसा प्रताप देखकर भी हनुमान के मन में जरा भी डर नहीं हुआ। वे ऐसे निःशंक खड़े रहे, जैसे सर्पों के समूह में गरुड़ निःशंक निर्भय) रहते हैं।

दो० – कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिसाद॥ 20॥

हनुमान को देखकर रावण दुर्वचन कहता हुआ खूब हँसा। फिर पुत्र-वध का स्मरण किया तो उसके हृदय में विषाद उत्पन्न हो गया॥ 20॥

कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहि कें बल घालेहि बन खीसा॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही॥

लंकापति रावण ने कहा – रे वानर! तू कौन है? किसके बल पर तूने वन को उजाड़कर नष्ट कर डाला? क्या तूने कभी मेरा नाम और यश कानों से नहीं सुना? रे शठ! मैं तुझे अत्यंत निःशंक देख रहा हूँ।

मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचति माया॥

तूने किस अपराध से राक्षसों को मारा? रे मूर्ख! बता, क्या तुझे प्राण जाने का भय नहीं है? (हनुमान ने कहा -) हे रावण! सुन, जिनका बल पाकर माया संपूर्ण ब्रह्मांडों के समूहों की रचना करती है;

जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा॥
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥

जिनके बल से हे दशशीश! ब्रह्मा, विष्णु, महेश (क्रमशः) सृष्टि का सृजन, पालन और संहार करते हैं; जिनके बल से सहस्रमुख (फणों) वाले शेष पर्वत और वनसहित समस्त ब्रह्मांड को सिर पर धारण करते हैं;

धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता॥
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥

जो देवताओं की रक्षा के लिए नाना प्रकार की देह धारण करते हैं और जो तुम्हारे-जैसे मूर्खों को शिक्षा देनेवाले हैं; जिन्होंने शिव के कठोर धनुष को तोड़ डाला और उसी के साथ राजाओं के समूह का गर्व चूर्ण कर दिया।

खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली॥

जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालि को मार डाला, जो सब-के-सब अतुलनीय बलवान थे;

दो० – जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तास दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥ 21॥

जिनके लेशमात्र बल से तुमने समस्त चराचर जगत को जीत लिया और जिनकी प्रिय पत्नी को तुम (चोरी से) हर लाए हो, मैं उन्हीं का दूत हूँ॥ 21॥

जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥

मैं तुम्हारी प्रभुता को खूब जानता हूँ, सहस्रबाहु से तुम्हारी लड़ाई हुई थी और बालि से युद्ध करके तुमने यश प्राप्त किया था। हनुमान के (मार्मिक) वचन सुनकर रावण ने हँसकर बात टाल दी।

खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥

हे (राक्षसों के) स्वामी! मुझे भूख लगी थी, (इसलिए) मैंने फल खाए और वानर स्वभाव के कारण वृक्ष तोड़े। हे (निशाचरों के) मालिक! देह सबको परम प्रिय है। कुमार्ग पर चलनेवाले (दुष्ट) राक्षस जब मुझे मारने लगे।

जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥

तब जिन्होंने मुझे मारा, उनको मैंने भी मारा। उस पर तुम्हारे पुत्र ने मुझको बाँध लिया। (किंतु), मुझे अपने बाँधे जाने की कुछ भी लज्जा नहीं है। मैं तो अपने प्रभु का कार्य करना चाहता हूँ।

बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥

हे रावण! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनो। तुम अपने पवित्र कुल का विचार करके देखो और भ्रम को छोड़कर भक्त भयहारी भगवान को भजो।

जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥

जो देवता, राक्षस और समस्त चराचर को खा जाता है, वह काल भी जिनके डर से अत्यंत डरता है, उनसे कदापि वैर न करो और मेरे कहने से जानकी को दे दो।

दो० – प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥ 22॥

खर के शत्रु रघुनाथ शरणागतों के रक्षक और दया के समुद्र हैं। शरण जाने पर प्रभु तुम्हारा अपराध भुलाकर तुम्हें अपनी शरण में रख लेंगे॥ 22॥

राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥

तुम राम के चरण कमलों को हृदय में धारण करो और लंका का अचल राज्य करो। ऋषि पुलस्त्य का यश निर्मल चंद्रमा के समान है। उस चंद्रमा में तुम कलंक न बनो।

राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषित बर नारी॥

राम नाम के बिना वाणी शोभा नहीं पाती, मद-मोह को छोड़, विचारकर देखो। हे देवताओं के शत्रु! सब गहनों से सजी हुई सुंदरी स्त्री भी कपड़ों के बिना (नंगी) शोभा नहीं पाती।

राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥

रामविमुख पुरुष की संपत्ति और प्रभुता रही हुई भी चली जाती है और उसका पाना न पाने के समान है। जिन नदियों के मूल में कोई जलस्रोत नहीं है (अर्थात जिन्हें केवल बरसात ही आसरा है) वे वर्षा बीत जाने पर फिर तुरंत ही सूख जाती हैं।

सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥

हे रावण! सुनो, मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रामविमुख की रक्षा करनेवाला कोई भी नहीं है। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी राम के साथ द्रोह करनेवाले तुमको नहीं बचा सकते।

दो० – मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥ 23॥

मोह ही जिनका मूल है ऐसे (अज्ञानजनित), बहुत पीड़ा देनेवाले, तमरूप अभिमान का त्याग कर दो और रघुकुल के स्वामी, कृपा के समुद्र भगवान राम का भजन करो॥ 23॥

जदपि कही कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥

यद्यपि हनुमान ने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और नीति से सनी हुई बहुत ही हित की वाणी कही, तो भी वह महान अभिमानी रावण बहुत हँसकर (व्यंग्य से) बोला कि हमें यह बंदर बड़ा ज्ञानी गुरु मिला!

मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥

रे दुष्ट! तेरी मृत्यु निकट आ गई है। अधम! मुझे शिक्षा देने चला है। हनुमान ने कहा – इससे उलटा ही होगा (अर्थात मृत्यु तेरी निकट आई है, मेरी नहीं)। यह तेरा मतिभ्रम (बुद्धि का फेर) है, मैंने प्रत्यक्ष जान लिया है।

सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥

हनुमान के वचन सुनकर वह बहुत ही कुपित हो गया। (और बोला -) अरे! इस मूर्ख का प्राण शीघ्र ही क्यों नहीं हर लेते? सुनते ही राक्षस उन्हें मारने दौड़े। उसी समय मंत्रियों के साथ विभीषण वहाँ आ पहुँचे।

नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥

उन्होंने सिर नवाकर और बहुत विनय करके रावण से कहा कि दूत को मारना नहीं चाहिए, यह नीति के विरुद्ध है। हे गोसाईं! कोई दूसरा दंड दिया जाए। सबने कहा – भाई! यह सलाह उत्तम है।

सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर॥

यह सुनते ही रावण हँसकर बोला – अच्छा तो, बंदर को अंग-भंग करके भेज (लौटा) दिया जाए।

दो० – कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥ 24॥

मैं सबको समझाकर कहता हूँ कि बंदर की ममता पूँछ पर होती है। अतः तेल में कपड़ा डुबोकर उसे इसकी पूँछ में बाँधकर फिर आग लगा दो॥ 24॥

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥
जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई। देखउ मैं तिन्ह कै प्रभुताई॥

जब बिना पूँछ का यह बंदर वहाँ (अपने स्वामी के पास) जाएगा, तब यह मूर्ख अपने मालिक को साथ ले आएगा। जिनकी इसने बहुत बड़ाई की है, मैं जरा उनकी प्रभुता (सामर्थ्य) तो देखूँ!

बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना॥
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥

यह वचन सुनते ही हनुमान मन में मुसकराए (और मन-ही-मन बोले कि) मैं जान गया, सरस्वती (इसे ऐसी बुद्धि देने में) सहायक हुई हैं। रावण के वचन सुनकर मूर्ख राक्षस वही (पूँछ में आग लगाने की) तैयारी करने लगे।

रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥

(पूँछ के लपेटने में इतना कपड़ा और घी-तेल लगा कि) नगर में कपड़ा, घी और तेल नहीं रह गया। हनुमान ने ऐसा खेल किया कि पूँछ बढ़ गई (लंबी हो गई)। नगरवासी लोग तमाशा देखने आए। वे हनुमान को पैर से ठोकर मारते हैं और उनकी हँसी करते हैं।

बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघुरूप तुरंता॥

ढोल बजते हैं, सब लोग तालियाँ पीटते हैं। हनुमान को नगर में फिराकर, फिर पूँछ में आग लगा दी। अग्नि को जलते हुए देखकर हनुमान तुरंत ही बहुत छोटे रूप में हो गए।

निबुकि चढ़ेउ कप कनक अटारीं। भईं सभीत निसाचर नारीं॥

बंधन से निकलकर वे सोने की अटारियों पर जा चढ़े। उनको देखकर राक्षसों की स्त्रियाँ भयभीत हो गईं।

दो० – हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥ 25॥

उस समय भगवान की प्रेरणा से उनचासों पवन चलने लगे। हनुमान अट्टहास करके गरजे और बढ़कर आकाश से जा लगे॥ 25॥

देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥

देह बड़ी विशाल, परंतु बहुत ही हल्की (फुर्तीली) है। वे दौड़कर एक महल से दूसरे महल पर चढ़ जाते हैं। नगर जल रहा है, लोग बेहाल हो गए हैं। आग की करोड़ों भयंकर लपटें झपट रही हैं।

तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहिं अवसर को हमहि उबारा॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई॥

हाय बप्पा! हाय मैया! इस अवसर पर हमें कौन बचाएगा? (चारों ओर) यही पुकार सुनाई पड़ रही है। हमने तो पहले ही कहा था कि यह वानर नहीं है, वानर का रूप धरे कोई देवता है!

साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥

साधु के अपमान का यह फल है कि नगर, अनाथ के नगर की तरह जल रहा है। हनुमान ने एक ही क्षण में सारा नगर जला डाला। एक विभीषण का घर नहीं जलाया।

ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥

(शिव कहते हैं -) हे पार्वती! जिन्होंने अग्नि को बनाया, हनुमान उन्हीं के दूत हैं। इसी कारण वे अग्नि से नहीं जले। हनुमान ने उलट-पलटकर (एक ओर से दूसरी ओर तक) सारी लंका जला दी। फिर वे समुद्र में कूद पड़े॥

दो० – पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥ 26॥

पूँछ बुझाकर, थकावट दूर करके और फिर छोटा-सा रूप धारण कर हनुमान जानकी के सामने हाथ जोड़कर जा खड़े हुए॥ 26॥

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥

(हनुमान ने कहा -) हे माता! मुझे कोई चिह्न (पहचान) दीजिए, जैसे रघुनाथ ने मुझे दिया था। तब सीता ने चूड़ामणि उतारकर दी। हनुमान ने उसको हर्षपूर्वक ले लिया।

कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ सम संकट भारी॥

(जानकी ने कहा -) हे तात! मेरा प्रणाम निवेदन करना और इस प्रकार कहना – हे प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकार से पूर्णकाम हैं (आपको किसी प्रकार की कामना नहीं है), तथापि दीनों (दुःखियों) पर दया करना आपका विरद है (और मैं दीन हूँ) अतः उस विरद को याद करके, हे नाथ! मेरे भारी संकट को दूर कीजिए।

तात सक्रसुत कथा सनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥

हे तात! इंद्रपुत्र जयंत की कथा (घटना) सुनाना और प्रभु को उनके बाण का प्रताप समझाना (स्मरण कराना)। यदि महीने भर में नाथ न आए तो फिर मुझे जीती न पाएँगे।

कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥

हे हनुमान! कहो, मैं किस प्रकार प्राण रखूँ! हे तात! तुम भी अब जाने को कह रहे हो। तुमको देखकर छाती ठंडी हुई थी। फिर मुझे वही दिन और वही रात!

दो० – जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥ 27॥

हनुमान ने जानकी को समझाकर बहुत प्रकार से धीरज दिया और उनके चरणकमलों में सिर नवाकर राम के पास गमन किया॥ 27॥

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा॥

चलते समय उन्होंने महाध्वनि से भारी गर्जन किया, जिसे सुनकर राक्षसों की स्त्रियों के गर्भ गिरने लगे। समुद्र लाँघकर वे इस पार आए और उन्होंने वानरों को किलकिला शब्द (हर्षध्वनि) सुनाया।

हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥

हनुमान को देखकर सब हर्षित हो गए और तब वानरों ने अपना नया जन्म समझा। हनुमान का मुख प्रसन्न है और शरीर में तेज विराजमान है, (जिससे उन्होंने समझ लिया कि) ये रामचंद्र का कार्य कर आए हैं।

मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा॥

सब हनुमान से मिले और बहुत ही सुखी हुए, जैसे तड़पती हुई मछली को जल मिल गया हो। सब हर्षित होकर नए-नए इतिहास (वृत्तांत) पूछते- कहते हुए रघुनाथ के पास चले।

तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए॥
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥

तब सब लोग मधुवन के भीतर आए और अंगद की सम्मति से सबने मधुर फल (या मधु और फल) खाए। जब रखवाले बरजने लगे, तब घूँसों की मार मारते ही सब रखवाले भाग छूटे।

दो० – जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥ 28॥

उन सबने जाकर पुकारा कि युवराज अंगद वन उजाड़ रहे हैं। यह सुनकर सुग्रीव हर्षित हुए कि वानर प्रभु का कार्य कर आए हैं॥ 28॥

जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा॥

यदि सीता की खबर न पाई होती तो क्या वे मधुवन के फल खा सकते थे? इस प्रकार राजा सुग्रीव मन में विचार कर ही रहे थे कि समाज-सहित वानर आ गए।

आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥

(सबने आकर सुग्रीव के चरणों में सिर नवाया। कपिराज सुग्रीव सभी से बड़े प्रेम के साथ मिले। उन्होंने कुशल पूछी, (तब वानरों ने उत्तर दिया -) आपके चरणों के दर्शन से सब कुशल है। राम की कृपा से विशेष कार्य हुआ (कार्य में विशेष सफलता हुई है)।

नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥

हे नाथ! हनुमान ने सब कार्य किया और सब वानरों के प्राण बचा लिए। यह सुनकर सुग्रीव हनुमान से फिर मिले और सब वानरों समेत रघुनाथ के पास चले।

राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥

राम ने जब वानरों को कार्य किए हुए आते देखा तब उनके मन में विशेष हर्ष हुआ। दोनों भाई स्फटिक शिला पर बैठे थे। सब वानर जाकर उनके चरणों पर गिर पड़े।

दो० – प्रीति सहित सब भेंटे रघुपति करुना पुंज॥
पूछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥ 29॥

दया की राशि रघुनाथ सबसे प्रेम सहित गले लगकर मिले और कुशल पूछी। (वानरों ने कहा -) हे नाथ! आपके चरण कमलों के दर्शन पाने से अब कुशल है॥ 29॥

जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥

जाम्बवान ने कहा – हे रघुनाथ! सुनिए। हे नाथ! जिस पर आप दया करते हैं, उसे सदा कल्याण और निरंतर कुशल है। देवता, मनुष्य और मुनि सभी उस पर प्रसन्न रहते हैं।

सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रैलोक उजागर॥
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू॥

वही विजयी है, वही विनयी है और वही गुणों का समुद्र बन जाता है। उसी का सुंदर यश तीनों लोकों में प्रकाशित होता है। प्रभु की कृपा से सब कार्य हुआ। आज हमारा जन्म सफल हो गया।

नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥

हे नाथ! पवनपुत्र हनुमान ने जो करनी की, उसका हजार मुखों से भी वर्णन नहीं किया जा सकता। तब जाम्बवान ने हनुमान के सुंदर चरित्र (कार्य) रघुनाथ को सुनाए।

सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥

(वे चरित्र) सुनने पर कृपानिधि रामचंद के मन को बहुत ही अच्छे लगे। उन्होंने हर्षित होकर हनुमान को फिर हृदय से लगा लिया और कहा – हे तात! कहो, सीता किस प्रकार रहती और अपने प्राणों की रक्षा करती हैं?

दो० – नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥ 30॥

(हनुमान ने कहा -) आपका नाम रात-दिन पहरा देनेवाला है, आपका ध्यान ही किवाड़ है। नेत्रों को अपने चरणों में लगाए रहती हैं, यही ताला लगा है; फिर प्राण जाएँ तो किस मार्ग से?॥ 30॥

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥

चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि (उतारकर) दी। रघुनाथ ने उसे लेकर हृदय से लगा लिया। (हनुमान ने फिर कहा -) हे नाथ! दोनों नेत्रों में जल भरकर जानकी ने मुझसे कुछ वचन कहे –

अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी॥

छोटे भाई समेत प्रभु के चरण पकड़ना (और कहना कि) आप दीनबंधु हैं, शरणागत के दुःखों को हरनेवाले हैं और मैं मन, वचन और कर्म से आपके चरणों की अनुरागिणी हूँ। फिर स्वामी (आप) ने मुझे किस अपराध से त्याग दिया?

अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥

(हाँ) एक दोष मैं अपना (अवश्य) मानती हूँ कि आपका वियोग होते ही मेरे प्राण नहीं चले गए। किंतु हे नाथ! यह तो नेत्रों का अपराध है जो प्राणों के निकलने में हठपूर्वक बाधा देते हैं।

बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥
नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥

विरह अग्नि है, शरीर रूई है और श्वास पवन है; इस प्रकार (अग्नि और पवन का संयोग होने से) यह शरीर क्षणमात्र में जल सकता है। परंतु नेत्र अपने हित के लिए प्रभु का स्वरूप देखकर (सुखी होने के लिए) जल (आँसू) बरसाते हैं, जिससे विरह की आग से भी देह जलने नहीं पाती।

सीता कै अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥

सीता की विपत्ति बहुत बड़ी है। हे दीनदयालु! वह बिना कही ही अच्छी है (कहने से आपको बड़ा क्लेश होगा)।

दो० – निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥ 31॥

हे करुणानिधान! उनका एक-एक पल कल्प के समान बीतता है। अतः हे प्रभु! तुरंत चलिए और अपनी भुजाओं के बल से दुष्टों के दल को जीतकर सीता को ले आइए॥ 31॥

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना॥
बचन कायँ मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥

सीता का दुःख सुनकर सुख के धाम प्रभु के कमल नेत्रों में जल भर आया (और वे बोले -) मन, वचन और शरीर से जिसे मेरी ही गति (मेरा ही आश्रय) है, उसे क्या स्वप्न में भी विपत्ति हो सकती है?

कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी॥

हनुमान ने कहा – हे प्रभो! विपत्ति तो वही (तभी) है जब आपका भजन-स्मरण न हो। हे प्रभो! राक्षसों की बात ही कितनी है? आप शत्रु को जीतकर जानकी को ले आएँगे।

सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥

(भगवान कहने लगे -) हे हनुमान! सुन, तेरे समान मेरा उपकारी देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं है। मैं तेरा प्रत्युपकार (बदले में उपकार) तो क्या करूँ, मेरा मन भी तेरे सामने नहीं हो सकता।

सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥

हे पुत्र! सुन, मैंने मन में (खूब) विचार करके देख लिया कि मैं तुझसे उऋण नहीं हो सकता। देवताओं के रक्षक प्रभु बार-बार हनुमान को देख रहे हैं। नेत्रों में प्रेमाश्रुओं का जल भरा है और शरीर अत्यंत पुलकित है।

दो० – सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥ 32॥

प्रभु के वचन सुनकर और उनके (प्रसन्न) मुख तथा (पुलकित) अंगों को देखकर हनुमान हर्षित हो गए और प्रेम में विकल होकर ‘हे भगवन्‌! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो’ कहते हुए राम के चरणों में गिर पड़े॥ 32॥

बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥

प्रभु उनको बार-बार उठाना चाहते हैं, परंतु प्रेम में डूबे हुए हनुमान को चरणों से उठना सुहाता नहीं। प्रभु का करकमल हनुमान के सिर पर है। उस स्थिति का स्मरण करके शिव प्रेममग्न हो गए।

सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर॥
कपि उठाई प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा॥

फिर मन को सावधान करके शंकर अत्यंत सुंदर कथा कहने लगे – हनुमान को उठाकर प्रभु ने हृदय से लगाया और हाथ पकड़कर अत्यंत निकट बैठा लिया।
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥

हे हनुमान! बताओ तो, रावण के द्वारा सुरक्षित लंका और उसके बड़े बाँके किले को तुमने किस तरह जलाया? हनुमान ने प्रभु को प्रसन्न जाना और वे अभिमानरहित वचन बोले –

साखामग कै बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बधि बिपिन उजारा॥

बंदर का बस, यही बड़ा पुरुषार्थ है कि वह एक डाल से दूसरी डाल पर चला जाता है। मैंने जो समुद्र लाँघकर सोने का नगर जलाया और राक्षसगण को मारकर अशोक वन को उजाड़ डाला,

सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥

यह सब तो हे रघुनाथ! आप ही का प्रताप है। हे नाथ! इसमें मेरी प्रभुता (बड़ाई) कुछ भी नहीं है।

दो० – ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।
तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥ 33॥

हे प्रभु! जिस पर आप प्रसन्न हों, उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं है। आपके प्रभाव से रूई (जो स्वयं बहुत जल्दी जल जानेवाली वस्तु है) बड़वानल को निश्चय ही जला सकती है (अर्थात असंभव भी संभव हो सकता है)॥ 33॥

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥

हे नाथ! मुझे अत्यंत सुख देनेवाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा करके दीजिए। हनुमान की अत्यंत सरल वाणी सुनकर, हे भवानी! तब प्रभु राम ने ‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) कहा।

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥

हे उमा! जिसने राम का स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती। यह स्वामी-सेवक का संवाद जिसके हृदय में आ गया, वही रघुनाथ के चरणों की भक्ति पा गया।

सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा॥

प्रभु के वचन सुनकर वानरगण कहने लगे – कृपालु आनंदकंद राम की जय हो जय हो, जय हो! तब रघुनाथ ने कपिराज सुग्रीव को बुलाया और कहा – चलने की तैयारी करो।

अब बिलंबु केह कारन कीजे। तुरंत कपिन्ह कहँ आयसु दीजे॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥

अब विलंब किस कारण किया जाए? वानरों को तुरंत आज्ञा दो। (भगवान की) यह लीला (रावणवध की तैयारी) देखकर, बहुत-से फूल बरसाकर और हर्षित होकर देवता आकाश से अपने-अपने लोक को चले।

दो० – कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥ 34॥

वानरराज सुग्रीव ने शीघ्र ही वानरों को बुलाया, सेनापतियों के समूह आ गए। वानर-भालुओं के झुंड अनेक रंगों के हैं और उनमें अतुलनीय बल है॥ 34॥

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गर्जहिं भालु महाबल कीसा॥
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥

वे प्रभु के चरण कमलों में सिर नवाते हैं। महान बलवान रीछ और वानर गरज रहे हैं। राम ने वानरों की सारी सेना देखी। तब कमल नेत्रों से कृपापूर्वक उनकी ओर दृष्टि डाली।

राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥

राम कृपा का बल पाकर श्रेष्ठ वानर मानो पंखवाले बड़े पर्वत हो गए। तब राम ने हर्षित होकर प्रस्थान (कूच) किया। अनेक सुंदर और शुभ शकुन हुए।

जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥

जिनकी कीर्ति सब मंगलों से पूर्ण है, उनके प्रस्थान के समय शकुन होना, यह नीति है (लीला की मर्यादा है)। प्रभु का प्रस्थान जानकी ने भी जान लिया। उनके बाएँ अंग फड़क-फड़ककर मानो कहे देते थे (कि राम आ रहे हैं)।

जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहिं सोई॥
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहिं बानर भालु अपारा॥

जानकी को जो-जो शकुन होते थे, वही-वही रावण के लिए अपशकुन हुए। सेना चली, उसका वर्णन कौन कर सकता है? असंख्य वानर और भालू गर्जना कर रहे हैं।

नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥

नख ही जिनके शस्त्र हैं, वे इच्छानुसार (सर्वत्र बेरोक-टोक) चलनेवाले रीछ-वानर पर्वतों और वृक्षों को धारण किए कोई आकाश मार्ग से और कोई पृथ्वी पर चले जा रहे हैं। वे सिंह के समान गर्जना कर रहे हैं। (उनके चलने और गर्जने से) दिशाओं के हाथी विचलित होकर चिंग्घाड़ रहे हैं।

छं० – चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥

दिशाओं के हाथी चिंग्घाड़ने लगे, पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत चंचल हो गए (काँपने लगे) और समुद्र खलबला उठे। गंधर्व, देवता, मुनि, नाग, किन्नर सब के सब मन में हर्षित हुए कि (अब) हमारे दुःख टल गए। अनेकों करोड़ भयानक वानर योद्धा कटकटा रहे हैं और करोड़ों ही दौड़ रहे हैं। ‘प्रबल प्रताप कोसलनाथ राम की जय हो’ ऐसा पुकारते हुए वे उनके गुणसमूहों को गा रहे हैं।

सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ठ कठोर सो किमि सोहई॥
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥

उदार (परम श्रेष्ठ एवं महान) सर्पराज शेष भी सेना का बोझ नहीं सह सकते, वे बार-बार मोहित हो जाते (घबड़ा जाते) हैं और पुनः-पुनः कच्छप की कठोर पीठ को दाँतों से पकड़ते हैं। ऐसा करते (अर्थात बार-बार दाँतों को गड़ाकर कच्छप की पीठ पर लकीर-सी खींचते हुए) वे कैसे शोभा दे रहे हैं मानो राम की सुंदर प्रस्थान यात्रा को परम सुहावनी जानकर उसकी अचल पवित्र कथा को सर्पराज शेष कच्छप की पीठ पर लिख रहे हों।

दो० – एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥ 35॥

इस प्रकार कृपानिधान राम समुद्र तट पर जा उतरे। अनेकों रीछ-वानर वीर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे॥ 35॥

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब तें जारि गयउ कपि लंका॥
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उवारा॥

वहाँ (लंका में) जब से हनुमान लंका को जलाकर गए; तब से राक्षस भयभीत रहने लगे। अपने-अपने घरों में सब विचार करते हैं कि अब राक्षस कुल की रक्षा (का कोई उपाय) नहीं है।

जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥
दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी॥

जिसके दूत का बल वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके स्वयं नगर में आने पर कौन भलाई है (हम लोगों की बड़ी बुरी दशा होगी)? दूतियों से नगरवासियों के वचन सुनकर मंदोदरी बहुत ही व्याकुल हो गई।

रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥

वह एकांत में हाथ जोड़कर पति (रावण) के चरणों लगी और नीतिरस में पगी हुई वाणी बोली – हे प्रियतम! हरि से विरोध छोड़ दीजिए। मेरे कहने को अत्यंत ही हितकर जानकर हृदय में धारण कीजिए।

समुझत जासु दूत कइ करनी। स्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी॥
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥

जिनके दूत की करनी का विचार करते ही (स्मरण आते ही) राक्षसों की स्त्रियों के गर्भ गिर जाते हैं, हे प्यारे स्वामी! यदि भला चाहते हैं, तो अपने मंत्री को बुलाकर उसके (दूत के) साथ उनकी स्त्री को भेज दीजिए।

तव कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥

सीता आपके कुलरूपी कमलों के वन को दुःख देनेवाली जाड़े की रात्रि के समान आई है। हे नाथ! सुनिए, सीता को दिए (लौटाए) बिना शंभु और ब्रह्मा के किए भी आपका भला नहीं हो सकता।

दो० – राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥ 36॥

राम के बाण सर्पों के समूह के समान हैं और राक्षसों के समूह मेढ़क के समान। जब तक वे इन्हें ग्रस नहीं लेते (निगल नहीं जाते) तब तक हठ छोड़कर उपाय कर लीजिए॥ 36॥

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा॥

मूर्ख और जगत प्रसिद्ध अभिमानी रावण कानों से उसकी वाणी सुनकर खूब हँसा (और बोला -) स्त्रियों का स्वभाव सचमुच ही बहुत डरपोक होता है। मंगल में भी भय करती हो! तुम्हारा मन (हृदय) बहुत ही कच्चा (कमजोर) है।
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥
कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥

यदि वानरों की सेना आएगी तो बेचारे राक्षस उसे खाकर अपना जीवन निर्वाह करेंगे। लोकपाल भी जिसके डर से काँपते हैं, उसकी स्त्री डरती हो, यह बड़ी हँसी की बात है।

अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥

रावण ने ऐसा कहकर हँसकर उसे हृदय से लगा लिया और ममता बढ़ाकर (अधिक स्नेह दर्शाकर) वह सभा में चला गया। मंदोदरी हृदय में चिंता करने लगी कि पति पर विधाता प्रतिकूल हो गए।

बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई॥
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥

ज्यों ही वह सभा में जाकर बैठा, उसने ऐसी खबर पाई कि शत्रु की सारी सेना समुद्र के उस पार आ गई है। उसने मंत्रियों से पूछा कि उचित सलाह कहिए (अब क्या करना चाहिए?)। तब वे सब हँसे और बोले कि चुप किए रहिए (इसमें सलाह की कौन-सी बात है?)।

जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माहीं॥

आपने देवताओं और राक्षसों को जीत लिया, तब तो कुछ श्रम ही नहीं हुआ। फिर मनुष्य और वानर किस गिनती में हैं?

दो० – सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥ 37॥

मंत्री, वैद्य और गुरु – ये तीन यदि (अप्रसन्नता के) भय या (लाभ की) आशा से (हित की बात न कहकर) प्रिय बोलते हैं (ठकुर सुहाती कहने लगते हैं); तो (क्रमशः) राज्य, शरीर और धर्म – इन तीन का शीघ्र ही नाश हो जाता है॥ 37॥

सोइ रावन कहुँ बनी सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥

रावण के लिए भी वही सहायता (संयोग) आ बनी है। मंत्री उसे सुना-सुनाकर (मुँह पर) स्तुति करते हैं। (इसी समय) अवसर जानकर विभीषण आए। उन्होंने बड़े भाई के चरणों में सिर नवाया।

पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन॥
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरूप कहउँ हित ताता॥

फिर से सिर नवाकर अपने आसन पर बैठ गए और आज्ञा पाकर ये वचन बोले – हे कृपाल! जब आपने मुझसे बात (राय) पूछी ही है, तो हे तात! मैं अपनी बुद्धि के अनुसार आपके हित की बात कहता हूँ –

जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाईं॥

जो मनुष्य अपना कल्याण, सुंदर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना प्रकार के सुख चाहता हो, वह हे स्वामी! परस्त्री के ललाट को चौथ के चंद्रमा की तरह त्याग दे (अर्थात जैसे लोग चौथ के चंद्रमा को नहीं देखते, उसी प्रकार परस्त्री का मुख ही न देखे)।

चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥

चौदहों भुवनों का एक ही स्वामी हो, वह भी जीवों से वैर करके ठहर नहीं सकता (नष्ट हो जाता है)। जो मनुष्य गुणों का समुद्र और चतुर हो, उसे चाहे थोड़ा भी लोभ क्यों न हो, तो भी कोई भला नहीं कहता।

दो० – काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥ 38॥

हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ – ये सब नरक के रास्ते हैं। इन सबको छोड़कर राम को भजिए, जिन्हें संत (सत्पुरुष) भजते हैं॥ 38॥

तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥

हे तात! राम मनुष्यों के ही राजा नहीं हैं। वे समस्त लोकों के स्वामी और काल के भी काल हैं। वे (संपूर्ण ऐश्वर्य, यश, श्री, धर्म, वैराग्य एवं ज्ञान के भंडार) भगवान हैं; वे निरामय (विकाररहित), अजन्मा, व्यापक, अजेय, अनादि और अनंत ब्रह्म हैं।

गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपा सिंधु मानुष तनुधारी॥
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥

उन कृपा के समुद्र भगवान ने पृथ्वी, ब्राह्मण, गौ और देवताओं का हित करने के लिए ही मनुष्य शरीर धारण किया है। हे भाई! सुनिए, वे सेवकों को आनंद देनेवाले, दुष्टों के समूह का नाश करनेवाले और वेद तथा धर्म की रक्षा करनेवाले हैं।

ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥

वैर त्यागकर उन्हें मस्तक नवाइए। वे रघुनाथ शरणागत का दुःख नाश करनेवाले हैं। हे नाथ! उन प्रभु (सर्वेश्वर) को जानकी दे दीजिए और बिना ही कारण स्नेह करनेवाले राम को भजिए।

सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥

जिसे संपूर्ण जगत से द्रोह करने का पाप लगा है, शरण जाने पर प्रभु उसका भी त्याग नहीं करते। जिनका नाम तीनों तापों का नाश करनेवाला है, वे ही प्रभु (भगवान) मनुष्य रूप में प्रकट हुए हैं। हे रावण! हृदय में यह समझ लीजिए।

दो० – बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥ 39(क)॥

हे दशशीश! मैं बार-बार आपके चरणों लगता हूँ और विनती करता हूँ कि मान, मोह और मद को त्यागकर आप कोसलपति राम का भजन कीजिए॥ 39(क)॥

मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात॥ 39(ख)॥

मुनि पुलस्त्य ने अपने शिष्य के हाथ यह बात कहला भेजी है। हे तात! सुंदर अवसर पाकर मैंने तुरंत ही वह बात प्रभु (आप) से कह दी॥ 39(ख)॥

माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥

माल्यवान नाम का एक बहुत ही बुद्धिमान मंत्री था। उसने उन (विभीषण) के वचन सुनकर बहुत सुख माना (और कहा -) हे तात! आपके छोटे भाई नीति-विभूषण (नीति को भूषण रूप में धारण करनेवाले अर्थात नीतिमान) हैं। विभीषण जो कुछ कह रहे हैं उसे हृदय में धारण कर लीजिए।

रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ॥
माल्यवंत गह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥

(रावण ने कहा -) ये दोनों मूर्ख शत्रु की महिमा बखान रहे हैं। यहाँ कोई है? इन्हें दूर करो न! तब माल्यवान तो घर लौट गया और विभीषण हाथ जोड़कर फिर कहने लगे –

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥

हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि) और कुबुद्धि (खोटी बुद्धि) सबके हृदय में रहती है, जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकार की संपदाएँ (सुख की स्थिति) रहती हैं और जहाँ कुबुद्धि है वहाँ परिणाम में विपत्ति (दुःख) रहती है।

तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥

आपके हृदय में उलटी बुद्धि आ बसी है। इसी से आप हित को अहित और शत्रु को मित्र मान रहे हैं। जो राक्षस कुल के लिए कालरात्रि (के समान) हैं, उन सीता पर आपकी बड़ी प्रीति है।

दो० – तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार॥ 40॥

हे तात! मैं चरण पकड़कर आपसे भीख माँगता हूँ (विनती करता हूँ) कि आप मेरा दुलार रखिए (मुझ बालक के आग्रह को स्नेहपूर्वक स्वीकार कीजिए)। राम को सीता दे दीजिए, जिसमें आपका अहित न हो॥ 40॥

बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी॥
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मृत्यु अब आई॥

विभीषण ने पंडितों, पुराणों और वेदों द्वारा सम्मत (अनुमोदित) वाणी से नीति बखानकर कही। पर उसे सुनते ही रावण क्रोधित होकर उठा और बोला कि रे दुष्ट! अब मृत्यु तेरे निकट आ गई है!

जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥

अरे मूर्ख! तू जीता तो है सदा मेरा जिलाया हुआ (अर्थात मेरे ही अन्न से पल रहा है), पर हे मूढ़! पक्ष तुझे शत्रु का ही अच्छा लगता है। अरे दुष्ट! बता न, जगत में ऐसा कौन है जिसे मैंने अपनी भुजाओं के बल से न जीता हो?

मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥

मेरे नगर में रहकर प्रेम करता है तपस्वियों पर। मूर्ख! उन्हीं से जा मिल और उन्हीं को नीति बता। ऐसा कहकर रावण ने उन्हें लात मारी, परंतु छोटे भाई विभीषण ने (मारने पर भी) बार-बार उसके चरण ही पकड़े।

उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥

(शिव कहते हैं -) हे उमा! संत की यही बड़ाई (महिमा) है कि वे बुराई करने पर भी (बुराई करनेवाले की) भलाई ही करते हैं। (विभीषण ने कहा -) आप मेरे पिता के समान हैं, मुझे मारा सो तो अच्छा ही किया; परंतु हे नाथ! आपका भला राम को भजने में ही है।

सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥

(इतना कहकर) विभीषण अपने मंत्रियों को साथ लेकर आकाश मार्ग में गए और सबको सुनाकर वे ऐसा कहने लगे –

दो० – रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥ 41॥

राम सत्य संकल्प एवं (सर्वसमर्थ) प्रभु हैं और (हे रावण!) तुम्हारी सभा काल के वश है। अतः मैं अब रघुवीर की शरण जाता हूँ, मुझे दोष न देना॥ 41॥

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं॥
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥

ऐसा कहकर विभीषण ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस आयुहीन हो गए (उनकी मृत्यु निश्चित हो गई)। (शिव कहते हैं -) हे भवानी! साधु का अपमान तुरंत ही संपूर्ण कल्याण की हानि (नाश) कर देता है।

रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥

रावण ने जिस क्षण विभीषण को त्यागा, उसी क्षण वह अभागा वैभव (ऐश्वर्य) से हीन हो गया। विभीषण हर्षित होकर मन में अनेकों मनोरथ करते हुए रघुनाथ के पास चले।

देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥
जे पद परसि तरी रिषनारी। दंडक कानन पावनकारी॥

(वे सोचते जाते थे -) मैं जाकर भगवान के कोमल और लाल वर्ण के सुंदर चरण कमलों के दर्शन करूँगा, जो सेवकों को सुख देनेवाले हैं, जिन चरणों का स्पर्श पाकर ऋषि पत्नी अहल्या तर गईं और जो दंडकवन को पवित्र करनेवाले हैं।

जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥

जिन चरणों को जानकी ने हृदय में धारण कर रखा है, जो कपटमृग के साथ पृथ्वी पर (उसे पकड़ने को) दौड़े थे और जो चरणकमल साक्षात शिव के हृदयरूपी सरोवर में विराजते हैं, मेरा अहोभाग्य है कि उन्हीं को आज मैं देखूँगा।

दो० – जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥ 42॥

जिन चरणों की पादुकाओं में भरत ने अपना मन लगा रखा है, अहा! आज मैं उन्हीं चरणों को अभी जाकर इन नेत्रों से देखूँगा॥ 42॥

ऐहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंदु एहिं पारा॥
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥

इस प्रकार प्रेमसहित विचार करते हुए वे शीघ्र ही समुद्र के इस पार (जिधर राम की सेना थी) आ गए। वानरों ने विभीषण को आते देखा तो उन्होंने जाना कि शत्रु का कोई खास दूत है।

ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई॥

उन्हें (पहरे पर) ठहराकर वे सुग्रीव के पास आए और उनको सब समाचार कह सुनाए। सुग्रीव ने (राम के पास जाकर) कहा – हे रघुनाथ! सुनिए, रावण का भाई (आप से) मिलने आया है।

कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा॥
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया॥

प्रभु राम ने कहा – हे मित्र! तुम क्या समझते हो (तुम्हारी क्या राय है)? वानरराज सुग्रीव ने कहा – हे महाराज! सुनिए, राक्षसों की माया जानी नहीं जाती। यह इच्छानुसार रूप बदलनेवाला (छली) न जाने किस कारण आया है।

भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥

(जान पड़ता है) यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है, इसलिए मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इसे बाँध रखा जाए। (राम ने कहा -) हे मित्र! तुमने नीति तो अच्छी विचारी! परंतु मेरा प्रण तो है शरणागत के भय को हर लेना!

सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना॥

प्रभु के वचन सुनकर हनुमान हर्षित हुए (और मन-ही-मन कहने लगे कि) भगवान कैसे शरणागतवत्सल (शरण में आए हुए पर पिता की भाँति प्रेम करनेवाले) हैं।

दो० – सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥ 43॥

(राम फिर बोले -) जो मनुष्य अपने अहित का अनुमान करके शरण में आए हुए का त्याग कर देते हैं, वे पामर (क्षुद्र) हैं, पापमय हैं, उन्हें देखने में भी हानि है (पाप लगता है)॥ 43॥

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

जिसे करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या लगी हो, शरण में आने पर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥

पापी का यह सहज स्वभाव होता है कि मेरा भजन उसे कभी नहीं सुहाता। यदि वह (रावण का भाई) निश्चय ही दुष्ट हृदय का होता तो क्या वह मेरे सम्मुख आ सकता था?

निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥

जो मनुष्य निर्मल मन का होता है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट और छल-छिद्र नहीं सुहाते। यदि उसे रावण ने भेद लेने को भेजा है, तब भी हे सुग्रीव! अपने को कुछ भी भय या हानि नहीं है।

जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
जौं सभीत आवा सरनाईं। रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥

क्योंकि हे सखे! जगत में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण क्षणभर में उन सबको मार सकते हैं और यदि वह भयभीत होकर मेरी शरण आया है तो मैं तो उसे प्राणों की तरह रखूँगा।

दो० – उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत॥ 44॥

कृपा के धाम राम ने हँसकर कहा – दोनों ही स्थितियों में उसे ले आओ। तब अंगद और हनुमान सहित सुग्रीव ‘कपालु राम की जय हो’ कहते हुए चले॥ 44॥


सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥

विभीषण को आदर सहित आगे करके वानर फिर वहाँ चले, जहाँ करुणा की खान रघुनाथ थे। नेत्रों को आनंद का दान देनेवाले (अत्यंत सुखद) दोनों भाइयों को विभीषण ने दूर ही से देखा।

बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥

फिर शोभा के धाम राम को देखकर वे पलक (मारना) रोककर ठिठककर (स्तब्ध होकर) एकटक देखते ही रह गए। भगवान की विशाल भुजाएँ हैं, लाल कमल के समान नेत्र हैं और शरणागत के भय का नाश करनेवाला साँवला शरीर है।

सघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा॥
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥

सिंह के-से कंधे हैं, विशाल वक्षःस्थल (चौड़ी छाती) अत्यंत शोभा दे रहा है। असंख्य कामदेवों के मन को मोहित करनेवाला मुख है। भगवान के स्वरूप को देखकर विभीषण के नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया और शरीर अत्यंत पुलकित हो गया। फिर मन में धीरज धरकर उन्होंने कोमल वचन कहे।

नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥

हे नाथ! मैं दशमुख रावण का भाई हूँ। हे देवताओं के रक्षक! मेरा जन्म राक्षस कुल में हुआ है। मेरा तामसी शरीर है, स्वभाव से ही मुझे पाप प्रिय हैं, जैसे उल्लू को अंधकार पर सहज स्नेह होता है।

दो० – श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥ 45॥

मैं कानों से आपका सुयश सुनकर आया हूँ कि प्रभु भव (जन्म-मरण) के भय का नाश करनेवाले हैं। हे दुखियों के दुःख दूर करनेवाले और शरणागत को सुख देनेवाले रघुवीर! मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए॥ 45॥

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥

प्रभु ने उन्हें ऐसा कहकर दंडवत करते देखा तो वे अत्यंत हर्षित होकर तुरंत उठे। विभीषण के दीन वचन सुनने पर प्रभु के मन को बहुत ही भाए। उन्होंने अपनी विशाल भुजाओं से पकड़कर उनको हृदय से लगा लिया।

अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी॥
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥

छोटे भाई लक्ष्मण सहित गले मिलकर उनको अपने पास बैठाकर राम भक्तों के भय को हरनेवाले वचन बोले – हे लंकेश! परिवार सहित अपनी कुशल कहो। तुम्हारा निवास बुरी जगह पर है।

खल मंडली बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती॥

दिन-रात दुष्टों की मंडली में बसते हो। (ऐसी दशा में) हे सखे! तुम्हारा धर्म किस प्रकार निभता है? मैं तुम्हारी सब रीति (आचार-व्यवहार) जानता हूँ। तुम अत्यंत नीतिनिपुण हो, तुम्हें अनीति नहीं सुहाती।

बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया॥

हे तात! नरक में रहना वरन अच्छा है, परंतु विधाता दुष्ट का संग (कभी) न दे। (विभीषण ने कहा -) हे रघुनाथ! अब आपके चरणों का दर्शन कर कुशल से हूँ, जो आपने अपना सेवक जानकर मुझ पर दया की है।

दो० – तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥ 46॥

तब तक जीव की कुशल नहीं और न स्वप्न में भी उसके मन को शांति है, जब तक वह शोक के घर काम (विषय-कामना) को छोड़कर राम को नहीं भजता॥ 46॥

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥

लोभ, मोह, मत्सर (डाह), मद और मान आदि अनेकों दुष्ट तभी तक हृदय में बसते हैं, जब तक कि धनुष-बाण और कमर में तरकस धारण किए हुए रघुनाथ हृदय में नहीं बसते।

ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥

ममता पूर्ण अँधेरी रात है, जो राग-द्वेषरूपी उल्लुओं को सुख देनेवाली है। वह (ममतारूपी रात्रि) तभी तक जीव के मन में बसती है, जब तक प्रभु (आप) का प्रतापरूपी सूर्य उदय नहीं होता।

अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥

हे राम! आपके चरणारविंद के दर्शन कर अब मैं कुशल से हूँ, मेरे भारी भय मिट गए। हे कृपालु! आप जिस पर अनुकूल होते हैं, उसे तीनों प्रकार के भवशूल (आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ताप) नहीं व्यापते।

मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥

मैं अत्यंत नीच स्वभाव का राक्षस हूँ। मैंने कभी शुभ आचरण नहीं किया। जिनका रूप मुनियों के भी ध्यान में नहीं आता, उन प्रभु ने स्वयं हर्षित होकर मुझे हृदय से लगा लिया।

दो० – अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज॥ 47॥

हे कृपा और सुख के पुंज राम! मेरा अत्यंत असीम सौभाग्य है, जो मैंने ब्रह्मा और शिव के द्वारा सेवित युगल चरण कमलों को अपने नेत्रों से देखा॥ 47॥

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही॥

(राम ने कहा -) हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे काकभुशुंडि, शिव और पार्वती भी जानती हैं। कोई मनुष्य (संपूर्ण) जड़-चेतन जगत का द्रोही हो, यदि वह भी भयभीत होकर मेरी शरण तककर आ जाए,

तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥

और मद, मोह तथा नाना प्रकार के छल-कपट त्याग दे तो मैं उसे बहुत शीघ्र साधु के समान कर देता हूँ। माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार –

सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥

इन सबके ममत्वरूपी तागों को बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बनाकर उसके द्वारा जो अपने मन को मेरे चरणों में बाँध देता है (सारे सांसारिक संबंधों का केंद्र मुझे बना लेता है), जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं है।

अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥

ऐसा सज्जन मेरे हृदय में कैसे बसता है, जैसे लोभी के हृदय में धन बसा करता है। तुम-सरीखे संत ही मुझे प्रिय हैं। मैं और किसी के निहोरे से (कृतज्ञतावश) देह धारण नहीं करता।

दो० – सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥ 48॥

जो सगुण (साकार) भगवान के उपासक हैं, दूसरे के हित में लगे रहते हैं, नीति और नियमों में दृढ़ हैं और जिन्हें ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम है, वे मनुष्य मेरे प्राणों के समान हैं॥ 48॥

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥

हे लंकापति! सुनो, तुम्हारे अंदर उपर्युक्त सब गुण हैं। इससे तुम मुझे अत्यंत ही प्रिय हो। राम के वचन सुनकर सब वानरों के समूह कहने लगे – कृपा के समूह राम की जय हो!

सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥

प्रभु की वाणी सुनते हैं और उसे कानों के लिए अमृत जानकर विभीषण अघाते नहीं हैं। वे बार-बार राम के चरण कमलों को पकड़ते हैं अपार प्रेम है, हृदय में समाता नहीं है।

सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥

(विभीषण ने कहा -) हे देव! हे चराचर जगत के स्वामी! हे शरणागत के रक्षक! हे सबके हृदय के भीतर की जाननेवाले! सुनिए, मेरे हृदय में पहले कुछ वासना थी, वह प्रभु के चरणों की प्रीतिरूपी नदी में बह गई।

अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥

अब तो हे कृपालु! शिव के मन को सदैव प्रिय लगनेवाली अपनी पवित्र भक्ति मुझे दीजिए। ‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) कहकर रणधीर प्रभु राम ने तुरंत ही समुद्र का जल माँगा।

जदपि सखा तव इच्छा नहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥

(और कहा -) हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं है, पर जगत में मेरा दर्शन अमोघ है (वह निष्फल नहीं जाता)। ऐसा कहकर राम ने उनको राजतिलक कर दिया। आकाश से पुष्पों की अपार वृष्टि हुई।

दो० – रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥ 49(क)॥

राम ने रावण की क्रोधरूपी अग्नि में, जो अपनी (विभीषण की) श्वास (वचन) रूपी पवन से प्रचंड हो रही थी, जलते हुए विभीषण को बचा लिया और उसे अखंड राज्य दिया॥ 49(क)॥

जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ॥ 49(ख)॥

शिव ने जो संपत्ति रावण को दसों सिरों की बलि देने पर दी थी, वही संपत्ति रघुनाथ ने विभीषण को बहुत सकुचते हुए दी॥ 49(ख)॥

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥

ऐसे परम कृपालु प्रभु को छोड़कर जो मनुष्य दूसरे को भजते हैं, वे बिना सींग-पूँछ के पशु हैं। अपना सेवक जानकर विभीषण को राम ने अपना लिया। प्रभु का स्वभाव वानरकुल के मन को (बहुत) भाया।

पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक॥

फिर सब कुछ जाननेवाले, सबके हृदय में बसनेवाले, सर्वरूप (सब रूपों में प्रकट), सबसे रहित, उदासीन, कारण से (भक्तों पर कृपा करने के लिए) मनुष्य बने हुए तथा राक्षसों के कुल का नाश करनेवाले राम नीति की रक्षा करनेवाले वचन बोले –

सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँति॥

हे वीर वानरराज सुग्रीव और लंकापति विभीषण! सुनो, इस गहरे समुद्र को किस प्रकार पार किया जाए? अनेक जाति के मगर, साँप और मछलियों से भरा हुआ यह अत्यंत अथाह समुद्र पार करने में सब प्रकार से कठिन है।

कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥

विभीषण ने कहा – हे रघुनाथ! सुनिए, यद्यपि आपका एक बाण ही करोड़ों समुद्रों को सोखनेवाला है (सोख सकता है), तथापि नीति ऐसी कही गई है (उचित यह होगा) कि (पहले) जाकर समुद्र से प्रार्थना की जाए।

दो० – प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि॥
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥ 50॥

हे प्रभु! समुद्र आपके कुल में बड़े (पूर्वज) हैं, वे विचारकर उपाय बतला देंगे। तब रीछ और वानरों की सारी सेना बिना ही परिश्रम के समुद्र के पार उतर जाएगी॥ 50॥

सखा कही तुम्ह नीति उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई॥
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥

(राम ने कहा -) हे सखा! तुमने अच्छा उपाय बताया। यही किया जाए, यदि दैव सहायक हों। यह सलाह लक्ष्मण के मन को अच्छी नहीं लगी। राम के वचन सुनकर तो उन्होंने बहुत ही दुःख पाया।

नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥

(लक्ष्मण ने कहा -) हे नाथ! दैव का कौन भरोसा! मन में क्रोध कीजिए (ले आइए) और समुद्र को सुखा डालिए। यह दैव तो कायर के मन का एक आधार (तसल्ली देने का उपाय) है। आलसी लोग ही दैव-दैव पुकारा करते हैं।

सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई॥

यह सुनकर रघुवीर हँसकर बोले – ऐसे ही करेंगे, मन में धीरज रखो। ऐसा कहकर छोटे भाई को समझाकर प्रभु रघुनाथ समुद्र के समीप गए।

प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥

उन्होंने पहले सिर नवाकर प्रणाम किया। फिर किनारे पर कुश बिछाकर बैठ गए। इधर ज्यों ही विभीषण प्रभु के पास आए थे, त्यों ही रावण ने उनके पीछे दूत भेजे थे।

दो० – सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥ 51॥

कपट से वानर का शरीर धारण कर उन्होंने सब लीलाएँ देखीं। वे अपने हृदय में प्रभु के गुणों की और शरणागत पर उनके स्नेह की सराहना करने लगे॥ 51॥

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥

फिर वे प्रकट रूप में भी अत्यंत प्रेम के साथ राम के स्वभाव की बड़ाई करने लगे, उन्हें दुराव (कपट वेश) भूल गया। सब वानरों ने जाना कि ये शत्रु के दूत हैं और वे उन सबको बाँधकर सुग्रीव के पास ले आए।

कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए॥

सुग्रीव ने कहा – सब वानरो! सुनो, राक्षसों के अंग-भंग करके भेज दो। सुग्रीव के वचन सुनकर वानर दौड़े। दूतों को बाँधकर उन्होंने सेना के चारों ओर घुमाया।

बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥

वानर उन्हें बहुत तरह से मारने लगे। वे दीन होकर पुकारते थे, फिर भी वानरों ने उन्हें नहीं छोड़ा। (तब दूतों ने पुकारकर कहा -) जो हमारे नाक-कान काटेगा, उसे कोसलाधीश राम की सौगंध है।

सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए॥
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥

यह सुनकर लक्ष्मण ने सबको निकट बुलाया। उन्हें बड़ी दया लगी, इससे हँसकर उन्होंने राक्षसों को तुरंत ही छुड़ा दिया। (और उनसे कहा -) रावण के हाथ में यह चिट्ठी देना (और कहना -) हे कुलघातक! लक्ष्मण के शब्दों (संदेसे) को बाँचो।

दो० – कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार॥ 52॥

फिर उस मूर्ख से जबानी यह मेरा उदार (कृपा से भरा हुआ) संदेश कहना कि सीता को देकर उनसे (राम से) मिलो, नहीं तो तुम्हारा काल आ गया (समझो)॥ 52॥

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥
लक्ष्मण के चरणों में मस्तक नवाकर, राम के गुणों की कथा वर्णन करते हुए दूत तुरंत ही चल दिए। राम का यश कहते हुए वे लंका में आए और उन्होंने रावण के चरणों में सिर नवाए।

बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥
पुन कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥

दशमुख रावण ने हँसकर बात पूछी – अरे शुक! अपनी कुशल क्यों नहीं कहता? फिर उस विभीषण का समाचार सुना, मृत्यु जिसके अत्यंत निकट आ गई है।

करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जव कर कीट अभागी॥
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई॥

मूर्ख ने राज्य करते हुए लंका को त्याग दिया। अभागा अब जौ का कीड़ा (घुन) बनेगा (जौ के साथ जैसे घुन भी पिस जाता है, वैसे ही नर वानरों के साथ वह भी मारा जाएगा); फिर भालू और वानरों की सेना का हाल कह, जो कठिन काल की प्रेरणा से यहाँ चली आई है।

जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥

और जिनके जीवन का रक्षक कोमल चित्तवाला बेचारा समुद्र बन गया है (अर्थात उनके और राक्षसों के बीच में यदि समुद्र न होता तो अब तक राक्षस उन्हें मारकर खा गए होते)। फिर उन तपस्वियों की बात बता, जिनके हृदय में मेरा बड़ा डर है।

दो० – की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥ 53॥

उनसे तेरी भेंट हुई या वे कानों से मेरा सुयश सुनकर ही लौट गए? शत्रु सेना का तेज और बल बताता क्यों नहीं? तेरा चित्त बहुत ही चकित (भौंचक्का-सा) हो रहा है॥ 53॥

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥

(दूत ने कहा -) हे नाथ! आपने जैसे कृपा करके पूछा है, वैसे ही क्रोध छोड़कर मेरा कहना मानिए (मेरी बात पर विश्वास कीजिए)। जब आपका छोटा भाई राम से जाकर मिला, तब उसके पहुँचते ही राम ने उसको राजतिलक कर दिया।

रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हें दुख नाना॥
श्रवन नासिका काटैं लागे। राम सपथ दीन्हें हम त्यागे॥

हम रावण के दूत हैं, यह कानों से सुनकर वानरों ने हमें बाँधकर बहुत कष्ट दिए, यहाँ तक कि वे हमारे नाक-कान काटने लगे। राम की शपथ दिलाने पर कहीं उन्होंने हमको छोड़ा।

पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई॥
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी॥

हे नाथ! आपने राम की सेना पूछी, सो उसका वर्णन तो सौ करोड़ मुखों से भी नहीं किया जा सकता। अनेकों रंगों के भालू और वानरों की सेना है, जो भयंकर मुखवाले, विशाल शरीरवाले और भयानक हैं।

जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥

जिसने नगर को जलाया और आपके पुत्र अक्षय कुमार को मारा, उसका बल तो सब वानरों में थोड़ा है। असंख्य नामोंवाले बड़े ही कठोर और भयंकर योद्धा हैं। उनमें असंख्य हाथियों का बल है और वे बड़े ही विशाल हैं।

दो० – द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥ 54॥

द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख, केसरी, निशठ, शठ और जाम्बवान – ये सभी बल की राशि हैं॥ 54॥

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रैलोकहि गनहीं॥

ये सब वानर बल में सुग्रीव के समान हैं और इनके-जैसे (एक-दो नहीं) करोड़ों हैं; उन बहुत-सों को गिन ही कौन सकता है? राम की कृपा से उनमें अतुलनीय बल है। वे तीनों लोकों को तृण के समान (तुच्छ) समझते हैं।

अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥

हे दशग्रीव! मैंने कानों से ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो अकेले वानरों के सेनापति हैं। हे नाथ! उस सेना में ऐसा कोई वानर नहीं है, जो आपको रण में न जीत सके।

परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥

सब के सब अत्यंत क्रोध से हाथ मीजते हैं। पर रघुनाथ उन्हें आज्ञा नहीं देते। हम मछलियों और साँपों सहित समुद्र को सोख लेंगे। नहीं तो बड़े-बड़े पर्वतों से उसे भरकर पूर (पाट) देंगे।

मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका॥

और रावण को मसलकर धूल में मिला देंगे। सब वानर ऐसे ही वचन कह रहे हैं। सब सहज ही निडर हैं; इस प्रकार गरजते और डपटते हैं मानो लंका को निगल ही जाना चाहते हैं।

दो० – सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम॥ 55॥

सब वानर-भालू सहज ही शूरवीर हैं फिर उनके सिर पर प्रभु (सर्वेश्वर) राम हैं। हे रावण! वे संग्राम में करोड़ों कालों को जीत सकते हैं॥ 55॥

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई॥
सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥

राम के तेज (सामर्थ्य), बल और बुद्धि की अधिकता को लाखों शेष भी नहीं गा सकते। वे एक ही बाण से सैकड़ों समुद्रों को सोख सकते हैं, परंतु नीति निपुण राम ने (नीति की रक्षा के लिए) आपके भाई से उपाय पूछा।

तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं॥
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥

उनके (आपके भाई के) वचन सुनकर वे (राम) समुद्र से राह माँग रहे हैं, उनके मन में कृपा भरी है (इसलिए वे उसे सोखते नहीं)। दूत के ये वचन सुनते ही रावण खूब हँसा (और बोला -) जब ऐसी बुद्धि है, तभी तो वानरों को सहायक बनाया है!

सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई॥
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥

स्वाभाविक ही डरपोक विभीषण के वचन को प्रमाण करके उन्होंने समुद्र से मचलना (बालहठ) ठाना है। अरे मूर्ख! झूठी बड़ाई क्या करता है? बस, मैंने शत्रु (राम) के बल और बुद्धि की थाह पा ली।

सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥

जिसके विभीषण-जैसा डरपोक मंत्री हो, उसे जगत में विजय और विभूति (ऐश्वर्य) कहाँ? दुष्ट रावण के वचन सुनकर दूत को क्रोध बढ़ आया। उसने मौका समझकर पत्रिका निकाली।

रामानुज दीन्हीं यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती॥
बिहसि बाम कर लीन्हीं रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥

(और कहा -) राम के छोटे भाई लक्ष्मण ने यह पत्रिका दी है। हे नाथ! इसे बचवाकर छाती ठंडी कीजिए। रावण ने हँसकर उसे बाएँ हाथ से लिया और मंत्री को बुलवाकर वह मूर्ख उसे बँचाने लगा।

दो० – बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥ 56(क)॥

(पत्रिका में लिखा था -) अरे मूर्ख! केवल बातों से ही मन को रिझाकर अपने कुल को नष्ट-भ्रष्ट न कर। राम से विरोध करके तू विष्णु, ब्रह्मा और महेश की शरण जाने पर भी नहीं बचेगा॥ 56(क)॥

की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥ 56(ख)॥

या तो अभिमान छोड़कर अपने छोटे भाई विभीषण की भाँति प्रभु के चरण कमलों का भ्रमर बन जा। अथवा रे दुष्ट! राम के बाणरूपी अग्नि में परिवार सहित पतिंगा हो जा (दोनों में से जो अच्छा लगे सो कर)॥ 56(ख)॥

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥

पत्रिका सुनते ही रावण मन में भयभीत हो गया, परंतु मुख से (ऊपर से) मुसकराता हुआ वह सबको सुनाकर कहने लगा – जैसे कोई पृथ्वी पर पड़ा हुआ हाथ से आकाश को पकड़ने की चेष्टा करता हो, वैसे ही यह छोटा तपस्वी (लक्ष्मण) वाग्विलास करता है (डींग हाँकता है)।

कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥

शुक (दूत) ने कहा – हे नाथ! अभिमानी स्वभाव को छोड़कर (इस पत्र में लिखी) सब बातों को सत्य समझिए। क्रोध छोड़कर मेरा वचन सुनिए। हे नाथ! राम से वैर त्याग दीजिए।

अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही॥

यद्यपि रघुवीर समस्त लोकों के स्वामी हैं, पर उनका स्वभाव अत्यंत ही कोमल है। मिलते ही प्रभु आप पर कृपा करेंगे और आपका एक भी अपराध वे हृदय में नहीं रखेंगे।

जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥

जानकी रघुनाथ को दे दीजिए। हे प्रभु! इतना कहना मेरा कीजिए। जब उस (दूत) ने जानकी को देने के लिए कहा, तब दुष्ट रावण ने उसको लात मारी।

नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥

वह भी (विभीषण की भाँति) चरणों में सिर नवाकर वहीं चला, जहाँ कृपासागर रघुनाथ थे। प्रणाम करके उसने अपनी कथा सुनाई और राम की कृपा से अपनी गति (मुनि का स्वरूप) पाई।

रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥

(शिव कहते हैं -) हे भवानी! वह ज्ञानी मुनि था, अगस्त्य ऋषि के शाप से राक्षस हो गया था। बार-बार राम के चरणों की वंदना करके वह मुनि अपने आश्रम को चला गया।

दो० – बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥ 57॥

इधर तीन दिन बीत गए, किंतु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता। तब राम क्रोध सहित बोले – बिना भय के प्रीति नहीं होती!॥ 57॥

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति। सहज कृपन सन सुंदर नीति॥

हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निबाण से समुद्र को सोख डालूँ। मूर्ख से विनय, कुटिल के साथ प्रीति, स्वाभाविक ही कंजूस से सुंदर नीति (उदारता का उपदेश),

ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥

ममता में फँसे हुए मनुष्य से ज्ञान की कथा, अत्यंत लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से शम (शांति) की बात और कामी से भगवान की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसर में बीज बोने से होता है (अर्थात ऊसर में बीज बोने की भाँति यह सब व्यर्थ जाता है)।

अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥

ऐसा कहकर रघुनाथ ने धनुष चढ़ाया। यह मत लक्ष्मण के मन को बहुत अच्छा लगा। प्रभु ने भयानक (अग्नि) बाण संधान किया, जिससे समुद्र के हृदय के अंदर अग्नि की ज्वाला उठी।

मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥

मगर, साँप तथा मछलियों के समूह व्याकुल हो गए। जब समुद्र ने जीवों को जलते जाना, तब सोने के थाल में अनेक मणियों (रत्नों) को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मण के रूप में आया।

दो० – काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥ 58॥

(काकभुशुंडि कहते हैं -) हे गरुड़! सुनिए, चाहे कोई करोड़ों उपाय करके सींचे, पर केला तो काटने पर ही फलता है। नीच विनय से नहीं मानता, वह डाँटने पर ही झुकता है (रास्ते पर आता है)॥ 58॥

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥

समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़कर कहा – हे नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिए। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी – इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है।

तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥

आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिए उत्पन्न किया है, सब ग्रंथों ने यही गाया है। जिसके लिए स्वामी की जैसी आज्ञा है, वह उसी प्रकार से रहने में सुख पाता है।

प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥

प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा (दंड) दी; किंतु मर्यादा (जीवों का स्वभाव) भी आपकी ही बनाई हुई है। ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और स्त्री – ये सब ताड़ना के अधिकारी हैं।

प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥

प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जाएगी, इसमें मेरी बड़ाई नहीं है (मेरी मर्यादा नहीं रहेगी)। तथापि प्रभु की आज्ञा अपेल है (अर्थात आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं हो सकता) ऐसा वेद गाते हैं। अब आपको जो अच्छा लगे, मैं तुरंत वही करूँ।

दो० – सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥ 59॥

समुद्र के अत्यंत विनीत वचन सुनकर कृपालु राम ने मुसकराकर कहा – हे तात! जिस प्रकार वानरों की सेना पार उतर जाए, वह उपाय बताओ॥ 59॥

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥

(समुद्र ने कहा -) हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैं। उन्होंने लड़कपन में ऋषि से आशीर्वाद पाया था। उनके स्पर्श कर लेने से ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर जाएँगे।

मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥

मैं भी प्रभु की प्रभुता को हृदय में धारण कर अपने बल के अनुसार (जहाँ तक मुझसे बन पड़ेगा) सहायता करूँगा। हे नाथ! इस प्रकार समुद्र को बँधवाइए, जिससे तीनों लोकों में आपका सुंदर यश गाया जाए।

एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥

इस बाण से मेरे उत्तर तट पर रहनेवाले पाप की राशि दुष्ट मनुष्यों का वध कीजिए। कृपालु और रणधीर राम ने समुद्र के मन की पीड़ा सुनकर उसे तुरंत ही हर लिया (अर्थात बाण से उन दुष्टों का वध कर दिया)।

देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥

राम का भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित होकर सुखी हो गया। उसने उन दुष्टों का सारा चरित्र प्रभु को कह सुनाया। फिर चरणों की वंदना करके समुद्र चला गया।

छं० – निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥

समुद्र अपने घर चला गया, श्रीरघुनाथ को यह मत (उसकी सलाह) अच्छा लगा। यह चरित्र कलियुग के पापों को हरनेवाला है, इसे तुलसीदास ने अपनी बुद्धि के अनुसार गाया है। रघुनाथ के गुणसमूह सुख के धाम, संदेह का नाश करनेवाले और विषाद का दमन करनेवाले हैं। अरे मूर्ख मन! तू संसार की सब आशा-भरोसा त्यागकर निरंतर इन्हें गा और सुन।

दो० – सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥ 60॥

रघुनाथ का गुणगान संपूर्ण सुंदर मंगलों का देनेवाला है। जो इसे आदर सहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज (अन्य साधन) के ही भवसागर को तर जाएँगे॥ 60॥

 
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पंचमः सोपानः समाप्तः।
कलियुग के समस्त पापों का नाश करनेवाले श्री रामचरितमानस का यह पाँचवा सौपान समाप्त।
सुन्दरकाण्ड समाप्त




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यहाँ वहाँ हर कहीं hindi story


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उस दिन शाम को पाँच बजे ही संजीव ऑफिस से वापस आ गया था। लिफ्ट से ऊपर जाकर उसने अपार्टमेंट की घंटी बजाई तो रोज की तरह दरवाजा नहीं खुला। वह बाहर खड़ा इंतजार करता रहा। फिर दूसरी और तीसरी बार भी बजाई तो दरवाजा वैसे ही बंद रहा। तब उसे लगा कि उसके पापा कहीं चले गए हैं। यदि वे भीतर होते तो फौरन दरवाजा खोलते। लेकिन उन्हें मालूम भी तो नहीं था कि इस समय वह आ जाएगा, वर्ना वे बाहर नहीं जाते।

उसने अपने पिता रवींद्र बाबू को कॉल किया, “हलो पापा, कहाँ हैं आप?” रवींद्र बाबू नुक्कड़ वाली स्नैक्स की दुकान में खड़े समोसे खा रहे थे। उन्होंने सोचा कि संजीव ऑफिस से फोन कर रहा है। इसलिए इत्मीनान से बोले, “संजीव? कहो किसलिए फोन किया?”

यदि वे जानते कि संजीव बाहर खड़ा है तो इस तरह शांति से बात न करते। उनकी आवाज में घबराहट घुली होती… घर पहुँचने के लिए बेताब हो जाते।

संजीव ने कहा, “आप कहाँ हैं?”

“मैं इस गली की स्नैक्स वाली दुकान में समोसे खा रहा हूँ। मैं तुम दोनों के लिए भी लेता आऊँगा।” उनकी आवाज में वही शांति बरकरार थी।

संजीव ने कहा, “अच्छा, लेते आइएगा। पर अभी आइए। मैं घर के बाहर खड़ा हूँ।”

यह सुनते ही वे बेचैन हो गए। बोले, “ओ! आ गए क्या? अच्छा, मैं आ रहा हूँ तुरंत।”

उनकी आवाज में एक खुशी घुल गई थी। संजीव ऑफिस से आ गया है यह सुनकर उन्हें बड़ा अच्छा लगा था। बच्चों का घर लौटना उन्हें अपरिमित खुशी दे जाता था, क्योंकि उनके आसपास पसरा हुआ सन्नाटा दूर हो जाता था। जल्दी-जल्दी मुँह चलाकर वे मुँह में भरे समोसे को निगलने लगे। समोसे खाते हुए दुकानदार से बोले, “अच्छा, चार समोसे और पैक कर दो।”

यह कहकर वे एक हाथ से पेपर प्लेट थामे हुए दूसरे हाथ से अपनी जेब में बटुआ टटोलने लगे। पर बटुआ तो लेकर चले ही नहीं थे तो मिलता कैसे? टटोलते-टटोलते यह महसूस हुआ। तब तक हाथों में कुछ खुदरे नोट आ गए थे। उन्हें उँगलियों में थामकर दुकानदार की ओर बढ़ाते हुए बोले, “लो भाई, पैसे ले लो। मैं बटुआ तो घर पर ही भूल गया।”

दुकानदार ने नोट थामते हुए कहा, “कोई बात नहीं थी। पैसे फिर मिल जाते।” रवींद्र बाबू लगभग हर रोज इसी स्नैक्स की दुकान पर आते और कुछ-कुछ खाते। इसी से दुकानदार उन्हें पहचानता था। शाम के चार बजते कि खाने से अधिक बाहर निकलने की इच्छा जोर मारती। बाहर आकर लोगों को चलते-फिरते, आते-जाते देखते तो उन्हें लगता कि उनकी नसों में भी खून दौड़ रहा हैं। तब अपने हिस्से के अकेलेपन में निष्क्रिय हुआ दिमाग पूरी तरह सक्रिय हो उठता, तरह-तरह के ख्याल दिल की धड़कनों के साथ गुँथ जाते और वे पूरी जिजीविषा से भर उठते।

रवींद्र बाबू ने पेपर प्लेट डस्टबिन के हवाले किया। पेपर नैपकिन से हाथ पोंछते हुए समोसों का पैकेट उठाया और चल दिए। चार कदम चले होंगे तो मुँह में बसे स्वाद ने याद दिलाया कि वे पानी पीना तो भूल ही गए। सोचा कि चलो, कोई बात नहीं, घर जाकर ही पी लेंगे। अभी बेचारा संजीव घर के बाहर खड़ा होगा थका-माँदा। यह स्थिति बड़ी खराब होती है कि घर पहुँचो और घर में ताला बंद। पास में चाभी नहीं।

संजीव ने एक चाभी सुरुचि को दे रखी थी और दूसरी वह खुद रखता था। सुरुचि ऑफिस से उसके पहले ही घर पहुँच जाती थी। अतः चाभी उसके पास रहनी चाहिए थी कि उसे इंतजार न करना पड़े। अभी पापा के आने पर उसने अपने वाली चाभी पापा को दे दी।

रवींद्र बाबू वहाँ पहुँचे तो देखा कि संजीव बैग लिए खड़ा है। उन्होंने अपनी जेब टटोलकर चाभी निकाली। संजीव ने चाभी उनके हाथ से ले ली, क्योंकि वह जानता था कि उन्हें चाभी की होल में घुमाने में समय लगेगा। उन्हें डबल लॉक वाले डोर खोलने की आदत नहीं थी। दरवाजा खोलकर संजीव ने अपना बैग सोफे पर डाला और बैठ गया। रवींद्र बाबू ममता-भरी आँखों से उसे देखते हुए सोच रहे थे कि बेचारे बच्चे बारह-बारह घंटे बहुराष्ट्रीय कंपनियों में खटते हैं, तब जाकर एक मोटी पगार घर में आती है। इन्हीं रुपयों से सब कुछ होता है, नहीं तो शहर में एक कोठरी भी न हो पाए।

उन्होंने पूछा, “चाय पियोगे? बना दूँ?”

संजीव ने कहा, “नहीं, कॉफी पीकर आया हूँ ऑफिस से। और आपसे मैं चाय बनवाकर पियूँगा?” फिर थोड़ी देर बाद बोला, “सुरुचि अब आती ही होगी, वह तो बनाएगी ही।”

करीब घंटे-भर बाद सुरुचि आई। वह भी संजीव की तरह ही थकी हुई थी। आते ही अपने कमरे से लगे वाश-रूम में हाथ-मुँह धोने वाली चली गई। फिर चाय बनाकर एक-एक कप संजीव और रवींद्र बाबू के सामने रख दी और अपना कप हाथ में लेकर टीवी धीमी आवाज में खोलकर बैठ गई। संजीव लैपटॉप पर व्यस्त हो गया।

रवींद्र बाबू ने टोका, “अब तुम्हें ऑफिस में कम काम था कि यहाँ आकर भी लैपटॉप में सिर खपाने लगे?”

संजीव ने कहा, “पापा! आप नहीं समझिएगा। इससे कितनी सारे बातें हल हो जाती हैं। सारा काम ही हो जाता है इससे।”

यह सुनकर रवींद्र बाबू कुछ प्रशंसा और अचरज-भरी दृष्टि से उसे देखने लगे। सुरुचि को शायद टीवी के प्रोग्राम अच्छे नहीं लग रहे थे। वह अपने कमरे में उठकर चली गई।

यही दृश्य हर शाम का हुआ करता था और सवेरे का बिल्कुल इससे उल्टा। नौ बजते-बजते संजीव और सुरुचि दोनों ही ऑफिस के लिए निकल जाते थे। तब घर में वे ही अकेले बच जाते। पिंजरे में बंद मैना की तरह छटपटाने लगते। कभी पेपर पढ़ते, कभी कोई पत्रिका उलटते तो कभी टीवी ऑन करते। इन सबसे जब ऊबते तो सो जाते। यहाँ किसी से उनकी जान-पहचान न थी, न अपना कोई दोस्त ही था कि उसके यहाँ बैठकर कुछ वक्त गुजार लेते।

उन्हें अपने बेटे के पास आए हुए एक महीना हो गया था। एक नई दिनचर्या से उन्हें गुजरना पड़ रहा था। ऐसा न था कि वे कभी अपना घर-शहर छोड़कर बाहर नहीं रहे। जब तक नौकरी में रहे, कई जगहों पर गए, कितने तरह के लोगों और उनकी संस्कृतियों से मिलना-जुलना हुआ। पर तब की बात और थी। एक पूरा परिवार था – पत्नी, छोटे-छोटे बच्चे। दफ्तर से आते तो अपने को सबसे घिरा हुआ पाते। चारों ओर चहल-पहल का माहौल। अब वह बात न थी। अब उनकी पत्नी गुजर चुकी थी और साथ-साथ एक लंबा वक्त भी। सदा बदलती रहने वाली दुनिया ने इतना बदल दिया था उनकी जिंदगी को!

पहली बार जब वे इस महानगर में आए थे उन्हें अजीब लगा था कि यहाँ तो सारे दिन दरवाजा बंद रहता है। कई-कई घंटे एकांत में बताते हुए वे एक इनसान का चेहरा देखने को तरस जाते। जिस रात को वे आए उसके सवेरे आपस में कुछ बातचीत भी न हुई और बेटा-बहू दफ्तर चले गए तो वे बेचैन होने लगे कि तभी दरवाजे की घंटी बजी। वे खुश हुए कि चलो कोई आया। शायद पड़ोसी हो। पर पड़ोसी क्या दूसरे लोक में रहते थे? उनके फ्लैट भी दिन-दिन भर बंद रहते। शाम को मियाँ-बीवी थके-माँदे लौटते तो बंद घर खुलता। उन्हें यह सब नहीं मालूम था। तभी सोच बैठे कि पड़ोसी आया होगा। खुश होकर दरवाजा खोला था उन्होंने। सामने खड़ा था नेपाली रसोइया। उन्हें याद आया कि जाते-जाते सुरुचि बोल गई थी, “पापाजी, नेपाली खाना बनाने आएगा। जो मर्जी हो बनवा लीजिएगा। वह चाय-कॉफी भी बना देगा।”

नेपाली को देखकर वे मुस्कुरा उठे। बोले, “तो तुम प्रीतम हो?”

“हाँ साब।” उसने कहा था।

“ठीक है, आओ। मुझे सुरुचि ने तुम्हारे बारे में बताया था।”

“आप भैया के पापा हो न?”

“हाँ।”

“मुझे मालूम है। भाभी जी बोला था कि आप आएगा।”

वह पूरे अधिकार के साथ भीतर चला आया। उनकी ओर घूमकर बोला, “क्या खाओगे आप?”

“जो रोज बनाते हो, वही बना दो।” रवींद्र बाबू बोले।

इतना सुनते ही वह अपने काम में मशगूल हो गया। वे पास ही सोफे पर बैठे हुए सिंक से पानी निकलने की आवाज, कढ़ाई में सब्जी छौंके जाने की छनक, प्रेशर कुकर की सीटी, कढ़ाई और छलनी की आपसी ठनर-मनर सुनते रहे। मुश्किल से बीस मिनट बीते होंगे कि नेपाली ने सारा खाना तैयार करके टेबुल पर लगा दिया। उसके बाद बाहर जाते हुए बोला, “दरवाजा बंद कर लो साब।”

रवींद्र बाबू उसके काम की तेजी को देखकर अवाक हो गए थे। भला इतनी जल्दी खाना कैसे बन गया? वे जितना चकराए उतना ही उदास भी हुए उसे बाहर निकलते देखकर। वह सिटकिनी खोलकर चला गया था और वे पीछे उसकी पीठ निहारते रह गए थे। वाह! आया भी और चला भी गया। क्या बनाया होगा उसने? डायनिंग टेबल पर लगे कैसरोल्स को उन्होंने खोल-खोलकर देखा था। पूरा उत्तर भारतीय खाना था। एक भी आइटम कम नहीं। चावल, दाल, सब्जी के साथ सलाद और चटनी तक बनाकर रख दी थी उसने! रसोइया को आया देखकर उनके मन में एक छिपी आशा जगी थी कि उन दोनों के बीच थोड़ी बातचीत होगी। कुछ वह पूछेगा, कुछ ये पूछेंगे। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, धत…!

धीरे-धीरे उस महानगर में रहते हुए रवींद्र बाबू ने सीख लिया था कि कैसे समय बिताया जाए। वे अपने मित्रों को कॉल करते और देर तक मोबाइल पर बातें करते रहते। जब तक बातें होती रहतीं, उन्हें लगता कि वे एक चलती-फिरती, जीती-जागती दुनिया से जुड़े हुए हैं, वरना इस शहर के अनजाने चेहरों के समुद्र में एक भी पहचाना चेहरा उन्हें नजर नहीं आता था। तब उनकी मनःस्थिति एक भटके हुए जहाज की हो जाती। कहाँ जाएँ… क्या करें… सब कुछ अपरिचित… अटूट एकाकीपन।

अकेले रेल या बस में सफर करना उन्हें कभी बुरा नहीं लगा था, बल्कि कभी-कभी तो उन्होंने इसे एन्जॉय भी किया था। एकदम भीड़-भाड़ से मुक्त। परंतु अपना विधुर जीवन जीते हुए उन्हें लगता था कि जिंदगी का एकाकी सफर रेल या बस का सफर नहीं है जो इसका लुत्फ उठा लिया जाए। इसे जो जीता है वही समझता है। जीवन संगिनी को गुजरे एक अरसा हो गया था। पत्नी की जरूरत जितनी पहले थी, उससे कम आज नहीं थी। बल्कि उन्हें लगता था कि अभी उसका होना अधिक जरूरी था। अब उनकी जिंदगी क्या थी? एक सूखे पत्ते की तरह उड़कर वे यहाँ से वहाँ चले जाते थे – जिधर हवा ले गई, उधर ही उड़ गए। अपना कोई वजूद ही नहीं रह गया था।

वे यहाँ पर अपने परिचित बनाने की कोशिश करने लगे थे। शुरू-शुरू में सिक्योरिटी गार्ड, दुकानदार और सब्जीवालों से ही कुछ जरूरत से अधिक बातें करने लगे थे ताकि वे इन्हें पहचानें। जाते-जाते दोस्ताना नजरों से उन्हें देखते। धीरे-धीरे आस-पास के लोग इन्हें जानने लगे थे। इन्हें अच्छा लगता था जब कोई आँखों में पहचान लिए इनकी ओर देखता और इनका हाल-चाल पूछ लेता। घर में सब्जी लाने का काम इन्होंने अपने जिम्मे ले लिया था कि इसी बहाने लोगों से कुछ बात भी हो जाएगी। बातचीत करके थोड़ा प्रफुल्लित महसूस करते थे।

फिर भी पूरे दिन की लंबाई में पसरा हुआ समय नहीं कटता था। खाना बन जाता था, कपड़े धुल जाते थे। काम खत्म है। खाना लगा हुआ है, वे खाएँ या न खाएँ। निपट अकेले रहते हुए खाने की इच्छा भी दब जाती थी। कुछ-कुछ करके समय को टुकड़ों-टुकड़ों में काटने की कोशिश जी-जान से जारी रहती। फ्लैट के पूरब में आंजनेय का मंदिर था। कभी-कभी उधर निकल जाते। उत्तर की ओर बड़ा सुंदर गणेश मंदिर था। शाम को टहलते हुए किसी दिन उधर भी निकल जाते। दर्शन करके बाहर आते तो वहीं प्रांगण में बेंच पर शांति के साथ बैठकर समय बिताते। इतना करने के बाद भी समय बिताना मुश्किल था खासकर दिन का। तो उन्होंने सोचा कि ठीक है, अब वे ही बाल्कनी में रखे गमलों में पानी डाल दिया करेंगे। कुछ समय इसमें भी कटेगा।

यही सोचकर उन्होंने सुरुचि से एक दिन कहा था, “बेटा, इन गमलों को मैं ही सींच दिया करूँगा। जब तक मैं हूँ तब तक तुम बाई को मना कर दो।”

सुरुचि बोली थी, “पापा जी! आप सींचेंगे तो बाई की आदत खराब हो जाएगी। गमले सींचना उसका काम है।”

यह सुनकर रवींद्र बाबू चुप हो गए थे। ठीक ही तो कह रही थी वह। अब दो दिनों के लिए बाई की आदत क्यों खराब कर जाएँ?

उस दिन बेटा-बहू के दफ्तर जाने के बाद उन्होंने अखबार उठा लिया था। अखबार की एक-एक खबर पर नजर दौड़ाने लगे। रोज की वे ही सारी बातें। राजनीतिक उथल-पुथल, अपराध – उसमें भी बलात्कार। मन चिड़चिड़ा गया। एक भी खबर ऐसी नहीं थी कि मन खुश हो। उन्होंने अखबार एक ओर रख दिया था। पत्रिकाएँ तो पहले ही पढ़ी जा चुकी थीं। अकेले बैठकर सोचने लगे कि क्या किया जाए?

तभी कमरे के बाहर लगे गमलों की ओर उनका ध्यान गया। उनमें रोपे गए पौधों को देखकर वे सोचने लगे कि इन्हें देखकर तो पता ही नहीं चलता कि क्या मौसम है? सभी मौसमों में एक-सा ही रहते हैं। क्या जाड़ा, क्या गरमी और क्या बरसात? वे उठकर फूलों को निहारने लगे थे। तभी वे चौंके। नहीं, उनका सोचना सही नहीं था। अभी वसंत है और कुछ पौधों में सुआपंखी कोंपलें फूट रही हैं। यह देखकर अपने अकेलेपन में भी वे मुस्कुराने लगे। गौर से देखने के लिए अपना चश्मा ठीक कर वे पौधों पर झुक गए। वाह! कुदरत का करिश्मा! फूलों को सब पता है। उन्हें मालूम है कि वसंत आ रहा है। इस महानगर को मालूम हो न हो काम और जाम को फर्क पड़े या न पड़े! ये अपनी मौन आवाज में कह रहे हैं कुछ। इनकी सुनता भी कौन है? वे उन पौधों से बात करने लगे।

बोले, “तुम बोल रहे हो, मैं सुन रहा हूँ। मुझे भी मालूम है मेरे दोस्त कि वसंत आ गया है।”

अचानक उन्हें लगा जैसे कितने सारे नन्हें-मुन्नों से घिरे हुए हैं वे! उनके इर्द-गिर्द कितने सारे छोटे-छोटे बच्चे हैं। उनकी बाँहें हैं… बाँहें नहीं – पंख हैं… हरे-हरे पंख। वे सब ढूँढ़ रहे हैं आकाश, हवा और उजाला। वे अपने को तितली-जैसा हल्का महसूस करने लगे। कितनी हल्की हो गई थी उनकी साँसें? उन्होंने चारों ओर नजर घुमाई। हवा और आकाश को काटती हुई ऊँची-ऊँची बिल्डिंगें थीं, पर इस बाल्कनी में थोड़ा आकाश था, उसका खुलापन था, थोड़ा जीवन था… थोड़ी ताजगी… थोड़ी संजीवनी! हाँ, अब यही बैठेंगे वे, हवा और आकाश से बातें करते हुए। यहीं से दुनिया भी दिखती हैं, लोग भी दिखते हैं। अब रोज उनके बैठने की प्रिय जगह वही बाल्कनी हो गई थी। वे रोज ध्यान से एक-एक पौधे को देखते। पौधों में निकले अँखुए हर दिन थोड़ा बढ़े हुए लगते। एक सरसों के बराबर उगा अँकुर छोटी-छोटी पत्तियों में खुलने लगा था। देखते-ही-देखते कितनी ही धानी पत्तियाँ निकल आई थीं। पौधे झबरीले हो उठे थे।

उस दिन वे शाम को सब्जी लेकर लौटे तो मन न होते हुए भी टीवी खेाल दी। अचानक उन्हें अपने जबड़ों में दर्द महसूस हुआ। फिर यह टीसता चला गया और इतना बढ़ा कि दवा की जरूरत महसूस होने लगी। फोन करके संजीव को कहना चाहा कि लौटते हुए वह दवा लेता आए, पर उसे आने में अभी देर थी। दाँत का दर्द इस तरह बर्दाश्त से बाहर हो चला कि संजीव के आने तक वे इंतजार नहीं कर सकते थे। इस स्थिति में भी उन्हें ही दवा के लिए निकलना पड़ेगा। किसको कहते? घर में था कौन?

अतः वे दवा लाने चल दिए। दवा की दुकान नजदीक ही थी। शाम की स्याही घिरने लगी थी। सड़क पर वाहनों की आवा-जाही बनी हुई थी। किनारे चलने वाले पदयात्रियों की भी कमी नहीं थी। इसी भीड़ में रवींद्र बाबू खीझे हुए चल रहे थे। कभी-कभी उनका हाथ अपने दुखते हुए जबड़े पर चला जाता। दर्द और भीड़ ने उन्हें इस तरह जकड़ लिया था कि उन्हें लगने लगा कि न जाने किस दुनिया में वे आ गए हैं। गाड़ियों की हेडलाइट से आँखें चौंधिया जा रही थीं। वे सड़क पार करने के लिए एक ओर खड़े थे। तभी एक स्कूटर उन्हें मारती हुई निकल गई। इसके बाद की बात उन्हें नहीं मालूम।

आँखें खुलीं तो वे अस्पताल के बेड पर थे। बगल में खड़ी नर्स इंजेक्शन देने की तैयारी कर रही थी और संजीव पास में था। उन्हें होश में आया देख उसने पूछा, “कैसे हैं पापा?”

“पैरों में बहुत दर्द है और दाँत में भी। क्या हुआ है मुझे?” उन्होंने कराहते हुए कहा।

संजीव बोला, “आपको स्कूटर से धक्का लग गया था।”

“हाँ… अभी याद आ रहा है। मैं दवा लाने निकला था, क्योंकि दाँत में बहुत दर्द हो रहा था। एक स्कूटर मुझे मारते हुए निकल गई थी। …फिर पता नहीं क्या हुआ। मैं गिर गया था।”

“आप स्कूटर के धक्के से गिरकर बेहोश हो गए थे। यह तो अच्छा हुआ कि वहाँ कुछ लोगों ने आपको पहचान लिया और आकर सिक्युरिटी गार्ड से कहा। उसी ने मुझे खबर की।”

रवींद्र बाबू सुनकर चुप रहे। उन्हें अब वह दुर्घटना याद आने लगी थी।

संजीव ने कहा, “पापा! आपने दवा के लिए मुझे फोन कर दिया होता। आप स्वयं क्यों निकल गए?”

रवींद्र बाबू ने कराहते हुए कहा, “दर्द इतना था कि मैं तुम्हारे आने तक इंतजार नहीं कर सकता था।”

संजीव बोला, “खुशकिस्मती से आप बच गए पापा! आपको कुछ हो जाता तो?”

अभी रवींद्र बाबू भी यही सोच रहे थे कि वे भाग्य से बच गए। उनके पैरों की हड्डियाँ भी सही-सलामत थीं। वे डर गए यह सोचकर कि अपाहिज भी हो जा सकते थे। तब उन्हें कौन देखता?

अस्पताल से आने के बाद उन्होंने संजीव के यहाँ कुछ दिन और बिताए। अब वे सवेरे सैर के लिए उस समय जाते जब सड़क पर वाहन नहीं रहते थे। दुर्घटना के डर से बाहर न निकलते, यह भी संभव न था। इसीलिए वाहनों से बचते हुए वे फ्लैट से निकलकर स्नैक्स वाली दुकान से होते हुए अगले दोराहे तक जाते। फिर उस मुख्य सड़क को पकड़ते जिस पर बहुत कम गाड़ियाँ चलती थीं, साथ ही वह चौड़ी भी थी। वे सड़क की दोनों ओर लगे पेड़ों को पहचानते हुए जाते – यह शिरीष है, यह गुलमोहर, यह अमलताश, यह लैगनटेशिया और यह न जाने क्या? इस तरह वे एक अजीब आनंद से भर जाते। वे सोचने लगते कि यदि ये पेड़ न होते तो न जाने दुनिया कैसी लगती? धरती कैसी दिखती? शायद केशरहित स्त्री की तरह कुरुप।

एक दिन कुछ झिझकते हुए संजीव से बोले, “बेटा! अब मैं वापस जाना चाहता हूँ। काफी दिन हो गए यहाँ पर रहते हुए।”

संजीव ने कहा, “क्यों? कुछ समय और रहिए न हमारे साथ? क्या तकलीफ है आपको यहाँ पर?”

“तकलीफ तो कुछ भी नहीं, तुम लोग इतना ध्यान रखते हो मेरा! फिर भी…। बहुत दिन हो गए बाहर निकले हुए। अब जाऊँगा। ठीक है, अगले सप्ताह के लिए टिकट करा दो।”

हवाई अड्डे पर रवींद्र बाबू अपनी ट्रॉली लुढ़काते हुए निकल रहे थे तो एक परिचित चेहरा सामने की भीड़ में खड़ा इनका इंतजार कर रहा था। ड्राइवर असलम ने मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर इनके हाथ से ट्रॉली ले ली। कार पर बैठते ही उन्होंने अपने सर को पिछली सीट से टिका दिया था। कार पूरी रफ्तार से अपनी मंजिल की ओर बढ़ी जा रही थी। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। कार शहर से गुजरती हुई अपने गंतव्य की ओर मुड़ गई जो ढाई घंटे की दूरी पर स्थित था। सड़क के दाएँ-बाएँ धूल में नहाए पेड़-पौधे खड़े थे। महुआ की महक समेटे हुए खुली हवा आई और प्राणों में उतर गई। घर के कमरे में दाखिल होते ही सन्नाटे ने उनके लिए बाँहें फैला दीं। उन्होंने सन्नाटे को आलिंगन में भर लिया। आगोश से छूटकर सन्नाटे ने कहा, “मैंने तुम्हें बहुत मिस किया, रवींद्र!”

रवींद्र बाबू ने कहा, “मैंने भी तुम्हें बहुत मिस किया।”

                                  लेखक – अंजना वर्मा

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अपरिचित हिंदी स्टोरी

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अपरिचित / Aparichit hindi story

अपरिचित hindi story

अपरिचित मोहन राकेश जी के एक उत्तम रचना है। मोहन राकेश हिंदी साहित्य के एक जानेमाने साहित्यकार है। इनका जन्म 8 जनवरी 1925 को अमृतसर पंजाब में हुआ। मोहन राकेश जी का निधन 3 जनवरी 1972 को दिल्ली में हुआ। आपने उपन्यास , कहानी , नाटक, निबंध आदि की रचना की।आज हम मोहन राकेश जी की कहानी अपरिचित आपके साथ शेयर कर रहे हैं। यह कहानी आपके दिल को छू ले गी ऐसा हमारा विश्वास है
 

अपरिचित हिंदी स्टोरी

 

 

कोहरे की वजह से खिड़कियों के शीशे धुँधले पड़ गये थे। गाड़ी चालीस की रफ़्तार से सुनसान अँधेरे को चीरती चली जा रही थी। खिड़की से सिर सटाकर भी बाहर कुछ दिखाई नहीं देता था। फिर भी मैं देखने की कोशिश कर रहा था। कभी किसी पेड़ की हल्की-गहरी रेखा ही गुज़रती नज़र आ जाती तो कुछ देख लेने का सन्तोष होता। मन को उलझाए रखने के लिए इतना ही काफ़ी था। आँखों में ज़रा नींद नहीं थी। गाड़ी को जाने कितनी देर बाद कहीं जाकर रुकना था। जब और कुछ दिखाई न देता, तो अपना प्रतिबिम्ब तो कम से कम देखा ही जा सकता था। अपने प्रतिबिम्ब के अलावा और भी कई प्रतिबिम्ब थे। ऊपर की बर्थ पर सोये व्यक्ति का प्रतिबिम्ब अजब बेबसी के साथ हिल रहा था। सामने की बर्थ पर बैठी स्त्री का प्रतिबिम्ब बहुत उदास था। उसकी भारी पलकें पल-भर के लिए ऊपर उठतीं, फिर झुक जातीं। आकृतियों के अलावा कई बार नई-नई आवाज़ें ध्यान बँटा देतीं, जिनसे पता चलता कि गाड़ी पुल पर से जा रही है या मकानों की क़तार के पास से गुज़र रही है। बीच में सहसा इंजन की चीख़ सुनाई दे जाती,जिससे अँधेरा और एकान्त और गहरे महसूस होने लगते।
 
मैंने घड़ी में वक़्त देखा। सवा ग्यारह बजे थे। सामने बैठी स्त्री की आँखें बहुत सुनसान थीं। बीच-बीच में उनमें एक लहर-सी उठती और विलीन हो जाती। वह जैसे आँखों से देख नहीं रही थी, सोच रही थी। उसकी बच्ची, जिसे फर के कम्बलों में लपेटकर सुलाया गया था, ज़रा-ज़रा कुनमुनाने लगी। उसकी गुलाबी टोपी सिर से उतर गयी थी। उसने दो-एक बार पैर पटके, अपनी बँधी हुई मुट्ठियाँ ऊपर उठाईं और रोने लगी। स्त्री की सुनसान आँखें सहसा उमड़ आयीं। उसने बच्ची के सिर पर टोपी ठीक कर दी और उसे कम्बलों समेत उठाकर छाती से लगा लिया।
 
मगर इससे बच्ची का रोना बन्द नहीं हुआ। उसने उसे हिलाकर और दुलारकर चुप कराना चाहा, मगर वह फिर भी रोती रही। इस पर उसने कम्बल थोड़ा हटाकर बच्ची के मुँह में दूध दे दिया और उसे अच्छी तरह अपने साथ सटा लिया।
 
मैं फिर खिड़की से सिर सटाकर बाहर देखने लगा। दूर बत्तियों की एक क़तार नज़र आ रही थी। शायद कोई आबादी थी, या सिर्फ़ सडक़ ही थी। गाड़ी तेज़ रफ़्तार से चल रही थी और इंजन बहुत पास होने से कोहरे के साथ धुआँ भी खिड़की के शीशों पर जमता जा रहा था। आबादी या सडक़, जो भी वह थी, अब धीरे-धीरे पीछे रही जा रही थी। शीशे में दिखाई देते प्रतिबिम्ब पहले से गहरे हो गये थे। स्त्री की आँखें मुँद गयी थीं और ऊपर लेटे व्यक्ति की बाँह ज़ोर-ज़ोर से हिल रही थी। शीशे पर मेरी साँस के फैलने से प्रतिबिम्ब और धुँधले हो गये थे। यहाँ तक कि धीरे-धीरे सब प्रतिबिम्ब अदृश्य हो गये। मैंने तब जेब से रूमाल निकालकर शीशे को अच्छी तरह पोंछ दिया।
 
स्त्री ने आँखें खोल ली थीं और एकटक सामने देख रही थी। उसके होंठों पर हल्की-सी रेखा फैली थी जो ठीक मुस्कराहट नहीं थी। मुस्कराहट ने बहुत कम व्यक्त उस रेखा में कहीं गम्भीरता भी थी और अवसाद भी-जैसे वह अनायास उभर आयी किसी स्मृति की रेखा थी। उसके माथे पर हल्की-सी सिकुडऩ पड़ गयी थी।
 
बच्ची जल्दी ही दूध से हट गयी। उसने सिर उठाकर अपना बिना दाँत का मुँह खोल दिया और किलकारी भरती हुई माँ की छाती पर मुट्ठियों से चोट करने लगी। दूसरी तरफ़ से आती एक गाड़ी तेज़ रफ़्तार में पास से गुज़री तो वह ज़रा सहम गयी, मगर गाड़ी के निकलते ही और भी मुँह खोलकर किलकारी भरने लगी। बच्ची का चेहरा गदराया हुआ था और उसकी टोपी के नीचे से भूरे रंग के हल्के-हल्के बाल नज़र आ रहे थे। उसकी नाक ज़रा छोटी थी, पर आँखें माँ की ही तरह गहरी और फैली हुई थीं। माँ के गाल और कपड़े नोचकर उसकी आँखें मेरी तरफ घूम गयीं और वह बाँहें हवा में पटकती हुई मुझे अपनी किलकारियों का निशाना बनाने लगी।
 
स्त्री की पलकें उठीं और उसकी उदास आँखें क्षण-भर मेरी आँखों से मिली रहीं। मुझे उस क्षण-भर के लिए लगा कि मैं एक ऐसे क्षितिज को देख रहा हूँ जिसमें गहरी साँझ के सभी हल्के-गहरे रंग झिलमिला रहे हैं और जिसका दृश्यपट क्षण के हर सौवें हिस्से में बदलता जा रहा है…।
 
बच्ची मेरी तरफ़ देखकर बहुत हाथ पटक रही थी, इसलिए मैंने अपने हाथ उसकी तरफ़ बढ़ा दिये और कहा, “आ बेटे, आ…।”
 
मेरे हाथ पास आ जाने से बच्ची के हाथों का हिलना बन्द हो गया और उसके होंठ रुआँसे हो गये।
 
स्त्री ने बच्ची को अपने होंठों से छुआ और कहा, “जा बिट्‌टू, जाएगी उनके पास?”
 
लेकिन बिट्‌टू के होंठ और रुआँसे हो गये और वह माँ के साथ सट गयी।
 
“ग़ैर आदमी से डरती है,” मैंने मुस्कराकर कहा और हाथ हटा लिये।
 
स्त्री के होंठ भिंच गये और माथे की खाल में थोड़ा खिंचाव आ गया। उसकी आँखें जैसे अतीत में चली गयीं। फिर सहसा वहाँ से लौट आयी और वह बोली, “नहीं, डरती नहीं। इसे दरअसल आदत नहीं है। यह आज तक या तो मेरे हाथों में रही है या नौकरानी के…,” और वह उसके सिर पर झुक गयी। बच्ची उसके साथ सटकर आँखें झपकने लगी। महिला उसे हिलाती हुई थपकियाँ देने लगी। बच्ची ने आँखें मूँद लीं। महिला उसकी तरफ़ देखती हुई जैसे चूमने के लिए होंठ बढ़ाए उसे थपकियाँ देती रही। फिर एकाएक उसने झुककर उसे चूम लिया।
 
“बहुत अच्छी है हमारी बिट्‌टू, झट-से सो जाती है,” यह उसने जैसे अपने से कहा और मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में एक उदास-सा उत्साह भर रहा था।
 
“कितनी बड़ी है यह बच्ची?” मैंने पूछा।
 
“दस दिन बाद पूरे चार महीने की हो जाएगी,” वह बोली, “पर देखने में अभी उससे छोटी लगती है। नहीं?”
 
मैंने आँखों से उसकी बात का समर्थन किया। उसके चेहरे में एक अपनी ही सहजता थी-विश्वास और सादगी की। मैंने सोई हुई बच्ची के गाल को ज़रा-सा सहला दिया। स्त्री का चेहरा और भावपूर्ण हो गया।
 
“लगता है आपको बच्चों से बहुत प्यार है,” वह बोली, “आपके कितने बच्चे हैं?”
 
मेरी आँखें उसके चेहरे से हट गयीं। बिजली की बत्ती के पास एक कीड़ा उड़ रहा था।
 
“मेरे?” मैंने मुस्कराने की कोशिश करते हुए कहा, “अभी तो कोई नहीं है, मगर…।”
 
“मतलब ब्याह हुआ है, अभी बच्चे-अच्चे नहीं हुए,” वह मुस्कराई, “आप मर्द लोग तो बच्चों से बचे ही रहना चाहते हैं न?”
 
मैंने होंठ सिकोड़ लिये और कहा, “नहीं, यह बात नहीं…।”
 
“हमारे ये तो बच्ची को छूते भी नहीं,” वह बोली, “कभी दो मिनट के लिए भी उठाना पड़ जाए तो झल्लाने लगते हैं। अब तो ख़ैर वे इस मुसीबत से छूटकर बाहर ही चले गये हैं।” और सहसा उसकी आँखें छलछला आयीं। रुलाई की वजह से उसके होंठ बिलकुल उस बच्ची जैसे हो गये थे। फिर सहसा उसके होंठों पर मुस्कराहट लौट आयी-जैसा अक्सर सोए हुए बच्चों के साथ होता है। उसने आँखें झपककर अपने को सहेज लिया और बोली, “वे डॉक्टरेट के लिए इंग्लैंड गये हैं। मैं उन्हें बम्बई में जहाज़ पर चढ़ाकर आ रही हूँ।…वैसे छ:-आठ महीने की बात है। फिर मैं भी उनके पास चली जाऊँगी।”
 
फिर उसने ऐसी नज़र से मुझे देखा जैसे उसे शिकायत हो कि मैंने उसकी इतनी व्यक्तिगत बात उससे क्यों जान ली!
 
“आप बाद में अकेली जाएँगी?” मैंने पूछा, “इससे तो आप अभी साथ चली जातीं…।”
 
उसके होंठ सिकुड़ गये और आँखें फिर अन्तर्मुख हो गयीं। वह कई पल अपने में डूबी रही और उसी भाव से बोली, “साथ तो नहीं जा सकती थी क्योंकि अकेले उनके जाने की भी सुविधा नहीं थी। लेकिन उनको मैंने किसी तरह भेज दिया है। चाहती थी कि उनकी कोई तो चाह मुझसे पूरी हो जाए।…दीशी की बाहर जाने की बहुत इच्छा थी।…अब छ:-आठ महीने मैं अपनी तनख़ाह में से कुछ पैसा बचाऊँगी और थोड़ा-बहुत कहीं से उधार लेकर अपने जाने का इन्तज़ाम करूँगी।”
 
उसने सोच में डूबती-उतराती अपनी आँखों को सहसा सचेत कर लिया और फिर कुछ क्षण शिकायत की नज़र मुझे देखती रही। फिर बोली, “अभी बिट्‌टू भी बहुत छोटी है न? छ:-आठ महीने में यह बड़ी हो जाएगी और मैं भी तब तक थोड़ा और पढ़ लूँगी। दीशी की बहुत इच्छा है कि मैं एम.ए. कर लूँ। मगर मैं ऐसी जड़ और नाकारा हूँ कि उनकी कोई भी चाह पूरी नहीं कर पाती। इसीलिए इस बार उन्हें भेजने के लिए मैंने अपने सब गहने बेच दिए हैं। अब मेरे पास बस मेरी बिट्‌टू है, और कुछ नहीं।” और वह बच्ची के सिर पर हाथ फेरती हुई, भरी-भरी नज़र से उसे देखती रही।
 
बाहर वही सुनसान अँधेरा था, वही लगातार सुनाई देती इंजन की फक्‌-फक्‌। शीशे से आँख गड़ा लेने पर भी दूर तक वीरानगी ही वीरानगी नज़र आती थी।
 
मगर उस स्त्री की आँखों में जैसे दुनिया-भर की वत्सलता सिमट आयी थी। वह फिर कई क्षण अपने में डूबी रही। फिर उसने एक उसाँस लीं और बच्ची को अच्छी तरह कम्बलों में लपेटकर सीट पर लिटा दिया।
 
ऊपर की बर्थ पर लेटा हुआ आदमी खुर्राटे भर रहा था। एक बार करवट बदलते हुए वह नीचे गिरने को हुआ, पर सहसा हड़बड़ाकर सँभल गया। फिर कुछ ही देर में वह और ज़ोर से खुर्राटे भरने लगा।
 
“लोगों को जाने सफ़र में कैसे इतनी गहरी नींद आ जाती है!” वह स्त्री बोली, “मुझे दो-दो रातें सफ़र करना हो, तो भी मैं एक पल नहीं सो पाती। अपनी-अपनी आदत होती है!”
 
“हाँ, आदत की ही बात है,” मैंने कहा, “कुछ लोग बहुत निश्चिन्त होकर जीते हैं और कुछ होते हैं कि…।”
 
“बग़ैर चिन्ता के जी ही नहीं सकते!” और वह हँस दी। उसकी हँसी का स्वर भी बच्चों जैसा ही था। उसके दाँत बहुत छोटे-छोटे और चमकीले थे। मैंने भी उसकी हँसी में साथ दिया।
 
“मेरी बहुत ख़राब आदत है,” वह बोली, “मैं बात-बेबात के सोचती रहती हूँ। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मैं सोच-सोचकर पागल हो जाऊँगी। ये मुझसे कहते हैं कि मुझे लोगों से मिलना-जुलना चाहिए, खुलकर हँसना, बात करना चाहिए, मगर इनके सामने मैं ऐसे गुमसुम हो जाती हूँ कि क्या कहूँ? वैसे और लोगों से भी मैं ज़्यादा बात नहीं करती लेकिन इनके सामने तो चुप्पी ऐसी छा जाती है जैसे मुँह में ज़बान हो ही नहीं…।…अब देखिए न, इस वक़्त कैसे लतर-लतर बात कर रही हूँ!” और वह मुस्कराई। उसके चेहरे पर हल्की-सी संकोच की रेखा आ गयी।
 
“रास्ता काटने के लिए बात करना ज़रूरी हो जाता है,” मैंने कहा, “ख़ासतौर से जब नींद न आ रही हो।”
 
उसकी आँखें पल-भर फैली रहीं। फिर वह गरदन ज़रा झुकाकर बोली, “ये कहते हैं कि जिसके मुँह में ज़बान ही न हो, उसके साथ पूरी ज़िन्दगी कैसे काटी जा सकती है? ऐसे इन्सान में और एक पालतू जानवर में क्या फ़र्क़ है? मैं हज़ार चाहती हूँ कि इन्हें ख़ुश दिखाई दूँ और इनके सामने कोई न कोई बात करती रहूँ, लेकिन मेरी सारी कोशिशें बेकार चली जाती हैं। इन्हें फिर गुस्सा आ जाता है और मैं रो देती हूँ। इन्हें मेरा रोना बहुत बुरा लगता है।” कहते हुए उसकी आँखों में आँसू छलक आये, जिन्हें उसने अपनी साड़ी के पल्ले से पोंछ लिया।
 
“मैं बहुत पागल हूँ,” वह फिर बोली, “ये जितना मुझे टोकते हैं, मैं उतना ही ज़्यादा रोती हूँ। दरअसल ये मुझे समझ नहीं पाते। मुझे बात करना अच्छा नहीं लगता, फिर जाने क्यों ये मुझे बात करने के लिए मजबूर करते हैं?” और फिर माथे को हाथ से दबाए हुए बोली, “आप भी अपनी पत्नी से ज़बर्दस्ती बात करने के लिए कहते हैं?”
 
मैंने पीछे टेक लगाकर कन्धे सिकोड़ लिये और हाथ बगलों में दबाए बत्ती के पास उड़ते कीड़े को देखने लगा। फिर सिर को ज़रा-सा झटककर मैंने उसकी तरफ़ देखा। वह उत्सुक नज़र से मेरी तरफ़ देख रही थी।
 
“मैं?” मैंने मुस्कराने की चेष्टा करते हुए कहा, “मुझे यह कहने का कभी मौका ही नहीं मिल पाता। मैं बल्कि पाँच साल से यह चाह रहा हूँ कि वह ज़रा कम बात किया करे। मैं समझता हूँ कि कई बार इन्सान चुप रहकर ज़्यादा बात कह सकता है। ज़बान से कही बात में वह रस नहीं होता जो आँख की चमक से या होंठों के कम्पन से या माथे की एक लकीर से कही गयी बात में होता है। मैं जब उसे यह समझाना चाहता हूँ, तो वह मुझे विस्तारपूर्वक बात देती है कि ज़्यादा बात करना इन्सान की निश्छलता का प्रमाण है और मैं इतने सालों में अपने प्रति उसकी भावना को समझ ही नहीं सका! वह दरअसल कॉलेज में लेक्चरर है और अपनी आदत की वजह से घर में भी लेक्चर देती रहती है।”
 
“ओह!” वह थोड़ी देर दोनों हाथों में अपना मुँह छिपाए रही। फिर बोली, “ऐसा क्यों होता है, यह मेरी समझ में नहीं आता। मुझे दीशी से यही शिकायत है कि वे मेरी बात नहीं समझ पाते। मैं कई बार उनके बालों में अपनी उँगलियाँ उलझाकर उनसे बात करना चाहती हूँ, कई बार उनके घुटनों पर सिर रखकर मुँदी आँखों से उनसे कितना कुछ कहना चाहती हूँ। लेकिन उन्हें यह सब अचछा नहीं लगता। वे कहते हैं कि यह सब गुडिय़ों का खेल है, उनकी पत्नी को जीता-जागता इन्सान होना चाहिए। और मैं इन्सान बनने की बहुत कोशिश करती हूँ, लेकिन नहीं बन पाती, कभी नहीं बन पाती। इन्हें मेरी कोई आदत अच्छी नहीं लगती। मेरा मन होता है कि चाँदनी रात में खेतों में घूमूँ, या नदी में पैर डालकर घंटों बैठी रहूँ, मगर ये कहते हैं कि ये सब आइडल मन की वृत्तियाँ हैं। इन्हें क्लब, संगीत-सभाएँ और डिनर-पार्टियाँ अच्छी लगती हैं। मैं इनके साथ वहाँ जाती हूँ तो मेरा दम घुटने लगता है। मुझे वहाँ ज़रा अपनापन महसूस नहीं होता। ये कहते हैं कि तू पिछले जन्म में मेंढकी थी जो तुझे क्लब में बैठने की बजाय खेतों में मेंढकों की आवाज़ें सुनना ज़्यादा अच्छा लगता है। मैं कहती हूँ कि मैं इस जन्म में भी मेंढकी हूँ। मुझे बरसात में भीगना बहुत अच्छा लगता है। और भीगकर मेरा मन कुछ न कुछ गुनगुनाने को कहने लगता है-हालाँकि मुझे गाना नहीं आता। मुझे क्लब में सिगरेट के धुएँ में घुटकर बैठे रहना नहीं अच्छा लगता। वहाँ मेरे प्राण गले को आने लगते हैं।”
 
उस थोड़े-से समय में ही मुझे उसके चेहरे का उतार-चढ़ाव काफ़ी परिचित लगने लगा था। उसकी बात सुनते हुए मेरे मन पर हल्की उदासी छाने लगी थी, हालाँकि मैं जानता था कि वह कोई भी बात मुझसे नहीं कह रही-वह अपने से बात करना चाहती है और मेरी मौजूदगी उसके लिए सिर्फ़ एक बहाना है। मेरी उदासी भी उसके लिए न होकर अपने लिए थी, क्योंकि बात उससे करते हुए भी मुख्य रूप से मैं सोच अपने विषय में रहा था। मैं पाँच साल से मंज़िल दर मंज़िल विवाहित जीवन से गुज़रता आ रहा था-रोज़ यही सोचते हुए कि शायद आनेवाला कल ज़िन्दगी के इस ढाँचे को बदल देगा। सतह पर हर चीज़ ठीक थी, कहीं कुछ ग़लत नहीं था, मगर सतह से नीचे जीवन कितनी-कितनी उलझनों और गाँठों से भरा था! मैंने विवाह के पहले दिनों में ही जान लिया था कि नलिनी मुझसे विवाह करके सुखी नहीं हो सकी, क्योंकि मैं उसकी कोई भी महत्त्वाकांक्षा पूरी करने में सहायक नहीं हो सकता। वह एक भरा-पूरा घर चाहती थी, जिसमें उसका शासन हो और ऐसा सामाजिक जीवन जिसमें उसे महत्त्व का दर्जा प्राप्त हो। वह अपने से स्वतन्त्र अपने पति के मानसिक जीवन की कल्पना नहीं करती थी। उसे मेरी भटकने की वृत्ति और साधारण का मोह मानसिक विकृतियाँ लगती थीं जिन्हें वह अपने अधिक स्वस्थ जीवन-दर्शन से दूर करना चाहती थी। उसने इस विश्वास के साथ जीवन आरम्भ किया था कि वह मेरी त्रुटियों की क्षतिपूर्ति करती हुई बहुत शीघ्र मुझे सामाजिक दृष्टि से सफल व्यक्ति बनने की दिशा में ले जाएगी। उसकी दृष्टि में यह मेरे संस्कारों का दोष था जो मैं इतना अन्तर्मुख रहता था और इधर-उधर मिल-जुलकर आगे बढऩे का प्रयत्न नहीं करता था। वह इस परिस्थिति को सुधारना चाहता थी, पर परिस्थिति सुधरने की जगह बिड़ती गयी थी। वह जो कुछ चाहती थी, वह मैं नहीं कर पाता था और जो कुछ मैं चाहता था, वह उससे नहीं होता था। इससे हममें अक्सर चख्ï-चख्ï होने लगती थी और कई बार दीवारों से सिर टकराने की नौबत आ जाती थी। मगर यह सब हो चुकने पर नलिनी बहुत जल्दी स्वस्थ हो जाती थी और उसे फिर मुझसे यह शिकायत होती थी कि मैं दो-दो दिन अपने को उन साधारण घटनाओं के प्रभाव से मुक्त क्यों नहीं कर पाता। मगर मैं दो-दो दिन क्या, कभी उन घटनाओं के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाता था, औरत को जब वह सो जाती थी, तो घंटों तकिये में मुँह छिपाए कराहता रहता था। नलिनी आपसी झगड़े को उतना अस्वाभाविक नहीं समझती थी, जितना मेरे रात-भर जागने को, और उसके लिए मुझे नर्व टॉनिक लेने की सलाह दिया करती थी। विवाह के पहले दो वर्ष इसी तरह बीते थे और उसके बाद हम अलग-अलग जगह काम करने लगे थे। हालाँकि समस्या ज्यों की त्यों बनी थी, और जब भी हम इकट्‌ठे होते, वही पुरानी ज़िन्दगी लौट आती थी, फिर भी नलिनी का यह विश्वास अभी कम नहीं हुआ था कि कभी न कभी मेरे सामाजिक संस्कारों का उदय अवश्य होगा और तब हम साथ रहकर सुखी विवाहित जीवन व्यतीत कर सकेंगे।
 
“आप कुछ सोच रहे हैं?” उस स्त्री ने अपनी बच्ची के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा।
 
मैंने सहसा अपने को सहेजा और कहा, “हाँ, मैं आप ही की बात को लेकर सोच रहा था। कुछ लोग होते हैं, जिनसे दिखावटी शिष्टाचार आसानी से नहीं ओढ़ा जाता। आप भी शायद उन्हीं लोगों में से हैं।”
 
“मैं नहीं जानती,” वह बोली, “मगर इतना जानती हूँ कि मैं बहुत-से परिचित लोगों के बीच अपने को अपरिचित,बेगाना और अनमेल अनुभव करती हूँ। मुझे लगता है कि मुझमें ही कुछ कमी है। मैं इतनी बड़ी होकर भी वह कुछ नहीं जान-समझ पायी, जो लोग छुटपन में ही सीख जाते हैं। दीशी का कहना है कि मैं सामाजिक दृष्टि से बिलकुल मिसफिट हूँ।”
 
“आप भी यही समझती हैं?” मैंने पूछा।
 
“कभी समझती हूँ, कभी नहीं भी समझती,” वह बोली, “एक ख़ास तरह के समाज में मैं ज़रूर अपने को मिसफिट अनुभव करती हूँ। मगर…कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनके बीच जाकर मुझे बहुत अच्छा लगता है। ब्याह से पहले मैं दो-एक बार कॉलेज की पार्टियों के साथ पहाड़ों पर घूमने के लिए गयी थी। वहाँ सब लोगों को मुझसे यही शिकायत होती थी कि मैं जहाँ बैठ जाती हूँ, वहीं की हो सकती हूँ। मुझे पहाड़ी बच्चे बहुत अच्छे लगते थे। मैं उनके घर के लोगों से भी बहुत जल्दी दोस्ती कर लेती थी। एक पहाड़ी परिवार की मुझे आज तक याद है। उस परिवार के बच्चे मुझसे इतना घुल-मिल गये थे कि मैं बड़ी मुश्किल से उन्हें छोडक़र उनके यहाँ से चल पायी थी। मैं कुल दो घंटे उन लोगों के पास रही थी। दो घंटे में मैंने उन्हें नहलाया-धुलाया भी, और उनके साथ खेलती भी रही। बहुत ही अच्छे बच्चे थे वे। हाय, उनके चहरे इतने लाल थे कि क्या कहूँ! मैंने उनकी माँ से कहा कि वह अपने छोटे लडक़े किशनू को मेरे साथ भेज दे। वह हँसकर बोली कि तुम सभी को ले जाओ, यहाँ कौन इनके लिए मोती रखे हैं! यहाँ तो दो साल में इनकी हड्डियाँ निकल आएँगी, वहाँ खा-पीकर अच्छे तो रहेंगे। मुझे उसकी बात सुनकर रुलाई आने को हुई।…मैं अकेली होती, तो शायद कई दिनों के लिए उन लोगों के पास रह जाती। ऐसे लोगों में जाकर मुझे बहुत अच्छा लगता है।…अब तो आपको भी लग रहा होगा कि कितनी अजीब हूँ मैं! ये कहा करते हैं कि मुझे किसी अच्छे मनोविद्‌ से अपना विश्लेषण कराना चाहिए, नहीं तो किसी दिन मैं पागल होकर पहाड़ों पर भटकती फिरूँगी!”
 
“यह तो अपनी-अपनी बनावट की बात है,” मैंने कहा, “मुझे खुद आदिम संस्कारों के लोगों के बीच रहना बहुत अच्छा लगता है। मैं आज तक एक जगह घर बनाकर नहीं रह सका और न ही आशा है कि कभी रह सकूँगा। मुझे अपनी ज़िन्दगी की जो रात सबसे ज़्यादा याद आती है, वह रात मैंने पहाड़ी गूजरों की एक बस्ती में बिताई थी। उस रात उस बस्ती में एक ब्याह था, इसलिए सारी रात वे लोग शराब पीते और नाचते-गाते रहे। मुझे बहुत हैरानी हुई जब मुझे बताया गया कि वही गूजर दस-दस रुपये के लिए आदमी का ख़ून भी कर देते हैं!”
 
“आपको सचमुच इस तरह की ज़िन्दगी अच्छी लगती है?” उसने कुछ आश्चर्य और अविश्वास के साथ पूछा।
 
“आपको शायद ख़ुशी हो रही है कि पागल होने की उम्मीदवार आप अकेली ही नहीं हैं,” मैंने मुस्कराकर कहा। वह भी मुस्कराई। उसकी आँखें सहसा भावनापूर्ण हो उठीं। उस एक क्षण में मुझे उन आँखों में न जाने कितनी-कुछ दिखाई दिया-करुणा, क्षोभ, ममता, आर्द्रता, ग्लानि, भय, असमंजस और स्नेह! उसके होंठ कुछ कहने के लिए काँपे, लेकिन काँपकर ही रह गये। मैं भी चुपचाप उसे देखता रहा। कुछ क्षणों के लिए मुझे महसूस हुआ कि मेरा दिमाग़ बिलकुल ख़ाली है और मुझे पता नहीं कि मैं क्या कर रहा था और आगे क्या कहना चाहता था। सहसा उसकी आँखों में फिर वही सूनापन भरने लगा ओर क्षण-भर में ही वह इतना बढ़ गया कि मैंने उसकी तरफ़ से आँखें हटा लीं।
 
बत्ती के पास उड़ता कीड़ा उसके साथ सटकर झुलस गया था।
 
बच्ची नींद में मुस्करा रही थी।
 
खिड़की के शीशे पर इतनी धुँध जम गयी थी कि उसमें अपना चेहरा भी दिखाई नहीं देता था।
 
गाड़ी की रफ़्तार धीमी हो रही थी। कोई स्टेशन आ रहा था। दो-एक बत्तियाँ तेज़ी से निकल गयीं। मैंने खिड़की का शीशा उठा दिया। बाहर से आती ब$र्फानी हवा के स्पर्श ने स्नायुओं को थोड़ा सचेत कर दिया। गाड़ी एक बहुत नीचे प्लेटफार्म के पास आकर खड़ी हो रही थी।
 
“यहाँ कहीं थोड़ा पानी मिल जाएगा?”
 
मैंने चौंककर देखा कि वह अपनी टोकरी में से काँच का गिलास निकालकर अनिश्चित भाव से हाथ में लिये हैं। उसके चेहरे की रेखाएँ पहले से गहरी हो गयी थीं।
 
“पानी आपको पीने के लिए चाहिए?” मैंने पूछा।
 
“हाँ। कुल्ला करूँगी और पिऊँगी भी। न जाने क्यों होंठ कुछ चिपक-से रहे हैं। बाहर इतनी ठंड है, फिर भी…।”
 
“देखता हूँ, अगर यहाँ कोई नल-वल हो, तो…।”
 
मैंने गिलास उसके हाथ से ले लिया और जल्दी से प्लेटफ़ार्म पर उतर गया। न जाने कैसा मनहूस स्टेशन था कि कहीं पर भी कोई इन्सान नज़र नहीं आ रहा था। प्लेटफ़ार्म पर पहुँचते ही हवा के झोंकों से हाथ-पैर सुन्न होने लगे। मैंने कोट के कॉलर ऊँचे कर लिये। प्लेटफ़ार्म के जंगले के बाहर से फैलकर ऊपर आये दो-एक पेड़ हवा में सरसरा रहे थे। इंजन के भाप छोडऩे से लम्बी शूँ-ऊँ की आवाज़ सुनाई दे रही थी। शायद वहाँ गाड़ी सिग्नल न मिलने की वजह से रुक गयी थी।
 
दूर कई डिब्बे पीछे एक नल दिखाई दिया, तो मैं तेज़ी से उस तरफ़ चल दिया। ईंटों के प्लेटफ़ार्म पर अपने जूते का शब्द मुझे बहुत अजीब-सा लगा। मैंने चलते-चलते गाड़ी की तरफ़ देखा। किसी खिड़की से कोई चेहरा बाहर नहीं झाँक रहा था। मैं नल के पास जाकर गिलास में पानी भरने लगा। तभी हल्की-सी सीटी देकर गाड़ी एक झटके के साथ चल पड़ी। मैं भरा हुआ पानी का गिलास लिये अपने डिब्बे की तरफ़ दौड़ा। दौड़ते हुए मुझे लगा कि मैं उस डिब्बे तक नहीं पहुँच पाऊँगा और सर्दी में उस अँधेरे और सुनसान प्लेटफ़ार्म पर ही मुझे बिना सामान के रात बितानी होगी। यह सोचकर मैं और तेज़ दौडऩे लगा। किसी तरह अपने डिब्बे के बराबर पहुँच गया। दरवाज़ा खुला था और वह दरवाज़े के पास खड़ी थी। उसने हाथ बढ़ाकर गिलास मुझसे ले लिया। फुटबोर्ड पर चढ़ते हुए एक बार मेरा पैर ज़रा-सा फिसला, मगर अगले ही क्षण मैं स्थिर होकर खड़ा हो गया। इंजन तेज़ होने की कोशिश में हल्के-हल्के झटके दे रहा था और ईंटों के प्लेटफ़ार्म की जगह अब नीचे अस्पष्ट गहराई दिखाई देने लगी थी।
 
“अन्दर आ जाइए,” उसके ये शब्द सुनकर मुझे एहसास हुआ कि मुझे फुटबोर्ड से आगे भी कहीं जाना है। डिब्बे के अन्दर क़दम रखा, तो मेरे घुटने ज़रा-ज़रा काँप रहे थे।
 
अपनी जगह पर आकर मैंने टाँगें सीधी करके पीछे टेक लगा लीं। कुछ पल बाद आँखें खोलीं तो लगा कि वह इस बीच मुँह धो आयी है। फिर भी उसके चेहरे पर मुर्दनी-सी छा रही थी। मेरे होंठ सूख रहे थे, फिर भी मैं थोड़ा मुस्कराया।
 
“क्या बात है, आपका चेहरा ऐसा क्यों हो रहा है?” मैंने पूछा।
 
“मैं कितनी मनहूस हूँ…,” कहकर उसने अपना निचला होंठ ज़रा-सा काट लिया।
 
“क्यों?”
 
“अभी मेरी वज़ह से आपको कुछ हो जाता…।”
 
“यह खूब सोचा आपने!”
 
“नहीं। मैं हूँ ही ऐसी…,” वह बोली, “ज़िन्दगी में हर एक को दु:ख ही दिया है। अगर कहीं आप न चढ़ पाते…।”
 
“तो?”
 
“तो?” उसने होंठ ज़रा सिकोड़े, “तो मुझे पता नहीं…पर…।”
 
उसने ख़ामोश रहकर आँखें झुका लीं। मैंने देखा कि उसकी साँस जल्दी-जल्दी चल रही है। महसूस किया कि वास्तविक संकट की अपेक्षा कल्पना का संकट कितना बड़ा और ख़तरनाक होता है। शीशा उठा रहने से खिड़की से ठंडी हवा आ रही थी। मैंने खींचकर शीशा नीचे कर दिया।
 
“आप क्यों गये थे पानी लाने के लिए? आपने मना क्यों नहीं कर दिया?” उसने पूछा।
 
उसके पूछने के लहज़े से मुझे हँसी आ गयी।
 
“आप ही ने तो कहा था…।”
 
“मैं तो मूर्ख हूँ, कुछ भी कह देती हूँ। आपको तो सोचना चाहिए था।”
 
“अच्छा, मैं अपनी ग़लती मान लेता हूँ।”
 
इससे उसके मुरझाए होंठों पर भी मुस्कराहट आ गयी।
“आप भी कहेंगे, कैसी लडक़ी है,” उसने आन्तरिक भाव के साथ कहा। “सच कहती हूँ, मुझे ज़रा अक्ल नहीं है। इतनी बड़ी हो गयी हूँ, पर अक्ल रत्ती-भर नहीं है-सच!”
 
मैं फिर हँस दिया।
 
“आप हँस क्यों रहे हैं?” उसके स्वर में फिर शिकायत का स्पर्श आ गया।
 
“मुझे हँसने की आदत है!” मैंने कहा।
 
“हँसना अच्छी आदत नहीं है।”
 
मुझे इस पर फिर हँसी आ गयी।
 
वह शिकायत-भरी नज़र से मुझे देखती रही।
 
गाड़ी की रफ़्तार फिर तेज़ हो रही थी। ऊपर की बर्थ पर लेटा आदमी सहसा हड़बड़ाकर उठ बैठा और ज़ोर-ज़ोर से खाँसने लगा। खाँसी का दौरा शान्त होने पर उसने कुछ पल छाती को हाथ में दबाये रखा, फिर भारी आवाज़ में पूछा, “क्या बजा है?”
 
“पौने बारह,” मैंने उसकी तरफ़ देखकर उत्तर दिया।
 
“कुल पौने बारह?” उसने निराश स्वर में कहा और फिर लेट गया। कुछ ही देर में वह फिर खुर्राटे भरने लगा।
 
“आप भी थोड़ी देर सो जाइए।” वह पीछे टेक लगाए शायद कुछ सोच रही थी या केवल देख रही थी।
 
“आपको नींद आ रही है, आप सो जाइए,” मैंने कहा।
 
“मैंने आपसे कहा था न मुझे गाड़ी में नींद नहीं आती। आप सो जाइए।”
 
मैंने लेटकर कम्बल ले लिया। मेरी आँखें देर तक ऊपर की बत्ती को देखती रहीं जिसके साथ झुलसा हुआ कीड़ा चिपककर रह गया था।
 
“रजाई भी ले लीजिए, काफी ठंड है,” उसने कहा।
 
“नहीं, अभी ज़रूरत नहीं है। मैं बहुत-से गर्म कपड़े पहने हूँ।”
 
“ले लीजिए, नहीं बाद में ठिठुरते रहिएगा।”
 
“नहीं, ठिठुरूँगा नहीं,” मैंने कम्बल गले तक लपेटते हुए कहा, “और थोड़ी-थोड़ी ठंड महसूस होती रहे, तो अच्छा लगता है।”
 
“बत्ती बुझा दूँ?” कुछ देर बाद उसने पूछा।
 
“नहीं, रहने दीजिए।”
 
“नहीं, बुझा देती हूँ। ठीक से सो जाइए।” और उसने उठकर बत्ती बुझा दी। मैं काफी देर अँधेरे में छत की तरफ़ देखता रहा। फिर मुझे नींद आने लगी।
 
शायद रात आधी से ज़्यादा बीत चुकी थी, जब इंजन के भोंपू की आवाज़ से मेरी नींद खुली। वह आवाज़ कुछ ऐसी भारी थी कि मेरे सारे शरीर में एक झुरझुरी-सी भर गयी। पिछले किसी स्टेशन पर इंजन बदल गया था।
 
गाड़ी धीरे-धीरे चलने लगी तो मैंने सिर थोड़ा ऊँचा उठाया। सामने की सीट ख़ाली थी। वह स्त्री न जाने किस स्टेशन पर उतर गयी थी। इसी स्टेशन पर न उतरी हो, यह सोचकर मैंने खिड़की का शीशा उठा दिया और बाहर देखा। प्लेटफ़ार्म बहुत पीछे रह गया था और बत्तियों की क़तार के सिवा कुछ साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था। मैंने शीशा फिर नीचे खींच लिया। अन्दर की बत्ती अब भी बुझी हुई थी। बिस्तर में नीचे को सरकते हुए मैंने देखा कि कम्बल के अलावा मैं अपनी रजाई भी लिये हूँ जिसे अच्छी तरह कम्बल के साथ मिला दिया गया है। गरमी की कई एक सिहरनें एक साथ शरीर में भर गयीं।
 
ऊपर की बर्थ पर लेटा आदमी अब भी उसी तरह ज़ोर-ज़ोर से खुर्राटे भर रहा था।
 

Good morning quotes in hindi

Good morning quotes in hindi


Good morning quotes in hindi जो आपकी और आपके दोस्तों की सुबह को खुशनुमा बनाएंगे और आप दिन भर तरोताजा महसूस करेंगे। कुछ बेहतरीन good morning quotes :-




Quote 1 – “यदि आप असफल होते हैं तो आप निराश हो सकते हैं, लेकिन यदि आप कोशिश नहीं करते हैं तो आप बर्बाद हो जाते हैं।” good morning!


Quote 2 – “सूर्य हमें रोज स्मरण दिलाता है कि हम भी अंधेरे से फिर उठ सकते हैं, स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित हो सकते हैं।” good morning!


 Quote 4 – “जीवन वैसा ही बनता बनता है जैसा हम इसे बनाना चाहते है। सुखमय या दुखमय हमारी  इच्छा पर निर्भर करता है।”

 Quote 5 – “इससे कोई फर्क नही पड़ता कि आप कितने धीमे चलते हैं फर्क इससे पड़ता कि आप कितने दूर तक चलते हैं।” शुभ प्रभात 🙏

Quote 6 – “उठो हर सुबह एक और नया अवसर लेकर आती है।” good morning!


Quote 7 – “जीवन की एक और नई सुबह के लिए ईश्वर का धन्यवाद करें।

Quote 8 -आज सुबह ये वादा करो अपने आप से की तब तक प्रयास करते रहोगे जब तक कि अपना लक्ष्य प्राप्त नही कर लेते।good morning!


Quote 9 -“अंत में इससे कोई फर्क नही पड़ता की आपने कितना लम्बा जीवन जिया फर्क इससे पड़ता है कि आपने कैसा जीवन जिया ।” good morning!


Quote 10 – “कल आपके साथ जो भी हुआ उस सब को भूल कर नई सुबह के साथ नई शुरूआत करो।” good morning!


Quote 11 – “अपने सपनों की दिशा में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें! ज़िन्दगी ऐसे जियें जैसी आप ने कल्पना की है।”good morning!


Quote 12 – सफलता पर गर्व और असफलता पर शोक कभी न करें क्योंकि ये दोनों ही अस्थाई परिस्थिति हैं कभी भी बदल सकती हैं। शुभ प्रभात🙏


Quote 13 – “जीवन जन्म से मृत्यु के बीच का एक सफर है । व्यर्थ की चिंता छोड़कर इसका लुफ्त उठायें।”good morning!


Quote 14 – “जीवन एक खूबसूरत कहानी है।” good morning!


Quote 15 – “जिंदगी बहुत खूबसूरत है यहाँ खुश रहने की बहुत वजह है…हमेशा मुस्कुराते रहें।😊 good morning!


Quote 16 – “आपका वर्तमान जीवन आपकीे पिछली choice का परिणाम है, यदि आप कुछ अलग करना चाहते तो अपनी choice बदलें। शुभ प्रभात🙏


Quote 17 – “कल की चिंता से आपको आज कुछ हासिल नही होने वाला। व्यर्थ की चिंता छोडो और आज को enjoy करो। good morning!


Quote 18 – “आज पर focus करो क्योंकि आज कभी जाता नही और कल कभी आता नही।” शुभ प्रभात🙏


Quote 19 – ” result , एफर्ट पर निर्भर करता है।जैसा एफर्ट होगा वैसा ही result प्राप्त होगा।” good morning!


Quote 20 – “हर नया दिन नई ताकत और नये विचार लेकर आता है। good morning!



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मुहब्बत a love story in hindi

मुहब्बत a love story in hindi


रविंद्र कालिया हिंदी साहित्य के एक जाने माने रचनाकार हैं। उनकी श्रेष्ट कहानी मुहब्बत आपके साथ शेयर कर रहे हैं । in hindi story हमारे ब्लॉग पर हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ट कहानियों को हम प्रकाशित कर रहे हैं। ताकि हिंदी साहित्य के प्रति लोगो का रुझान बढ़ें और सभी हिंदी साहित्य की श्रेष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकें।


मुहब्बत a love story in hindi


A love story in hindi


कपिल चाय की चुस्कियाँ लेते हुए अखबार पढ़ रहा था, तभी गोपाल ने सूचना दी कि दो महिलाएँ मिलने आई हैं। कपिल टॉयलेट से फारिग हो कर ही किसी आगन्तुक से मिलना पसंद करता है। उसने खिन्न होते हुए कहा, ‘इतनी सुबह? मुवक्किल होंगी। दफ्तर में श्रीवास्तव होगा, उससे मिलवा दो।’

‘वे तो आपसे ही मिलना चाहती हैं। शायद कहीं बाहर से आयी हैं।’

‘अच्छा! ड्राईंगरूम में बैठाओ, अभी आता हूँ।’

कपिल टॉयलेट में घुस गया। इत्मीनान से हाथ मुँह धो कर जब वह नीचे आया तो उसने देखा, सोफे पर बैठी दोनों महिलाएँ चाय पी रही थीं। एक सत्तर के आसपास होगी और दूसरी पचास के। एक का कोई बाल काला नहीं था और दूसरी का कोई बाल सफेद नहीं था, मगर दोनों चश्मा पहने थीं। कपिल को आश्चर्य हुआ। कोई भी महिला उसे देख कर अभिवादन के लिए खड़ी नहीं हुई। बुजुर्ग महिला ने अपने पर्स से एक कागज निकाला और कपिल के हाथ में थमा दिया।

‘यह खत आपने लिखा था?’ उसने कड़े स्वर में पूछा।

कपिल ने कागज ले लिया और चश्मा लगा कर पढ़ने लगा। भावुकता और शेर-ओ-शायरी से भरा एक बचकाना मजमून था। उस कागज को पढ़ते हुए सहसा कपिल के चेहरे पर खिसियाहट भरी मुस्कान फैल गयी। बोला, ‘यह आपको कहाँ मिल गया? बहुत पुराना खत है। तीस बरस पहले लिखा गया था।’

‘पहले मेरी बात का जवाब दीजिए, क्या यह खत आपने लिखा था?’ बुजुर्ग महिला ने उसी सख्त लहजे में पूछा।

‘हैन्डराइटिंग तो मेरी ही है। लगता है, मैंने ही लिखा होगा।’

‘अजीब आदमी हैं आप? कितना कैजुअली ले रहे हैं मेरी बात को।’ बुजुर्ग महिला ने पत्र लगभग छीनते हुए कहा।

कपिल ने दूसरी महिला की ओर देखा जो अब तक निर्द्वन्द्व बैठी थी, पत्थर की तरह।

कपिल को यों अस्त-व्यस्त देख कर मुस्करायी।

उसके सफेद संगमरमरी दाँत पल भर में सारी कहानी कह गये।

‘अरे! सरोज, तुम! ‘कपिल जैसे उछल पड़ा, ‘इतने वर्ष कहाँ थीं? मैं विश्वास नहीं कर पा रहा हूँ, तीस साल बाद तुम अचानक मेरे यहाँ आ सकती हो। कहाँ गये बीच के साल?’

‘कहो, कैसे हो? कैसे बीते इतने साल?’

‘तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे साल नहीं दिन बीते हों। तीस साल एक उम्र होती है।’ ‘मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि तुमसे इस जिंदगी में कभी भेंट होगी।’

‘क्या अगले जन्म में मिलने की बात सोच रहे थे?’

‘यही समझ लो।’

‘इस एक कागज के टुकड़े के कारण तुम मेरे बहुत करीब रहे, हमेशा। मगर इसे गलत मत समझना।’

इतने में कपिल की पत्नी भी नीचे उतर आई। वह जानती थी कि नाश्ते के बाद ही कपिल नीचे उतरता है, चाहे कितना ही बड़ा मुवक्किल क्यों न आया हो।

‘यह मेरी पत्नी मंजुला है। देश के चोटी के कलाकारों में इनका नाम है। अब तक बीसियों रेकार्ड आ चुके हैं।’

‘जानती हूँ…’ सरोज बोली ‘नमस्कार।’

‘नमस्कार।’ मंजुला ने कहा और ‘एक्सक्यूज मी’ कह कर दोबारा सीढ़ियाँ चढ़ गयी। उसने सोचा होगा कोई नयी मुवक्किल आयी है। मंजुला की उदासीनता का कोई असर दोनों महिलाओं पर नहीं हुआ।

‘बच्चे कितने बड़े हो गये हैं?’ सरोज ने पूछा।

‘उसी उम्र में हैं, जिसमें मैंने यह खत लिखा था।’

‘शादी हो गयी या अभी खत ही लिख रहे हैं?’ सरोज ने ठहाका लगाया। कपिल ने साथ दिया।

‘बड़े की शादी हो चुकी है, दूसरे के लिये लड़की की तलाश है।’

‘क्या करते हैं?’ बुजुर्ग महिला ने पूछा।

‘बड़ा बेटा जिलाधिकारी है बहराइच में और छोटा मेरे साथ वकालत कर रहा है। मगर वह अभी कम्पीटीशन्स में बैठना चाहता है। सरोज की माँग में सिंदूर देख कर कपिल ने पूछा, तुम्हारे बच्चे कितने बड़े हैं?’

‘दो बेटियाँ हैं। एक डॉक्टर है, दूसरी डॉक्टरी पढ़ रही है।’

‘किसी डॉक्टर से शादी हो गयी थी? ‘कपिल ने पूछा।

‘बड़े होशियार हो।’ सरोज ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।

‘तुम भी कम होशियार नहीं थीं।’ कपिल ने कहा। कपिल के दिमाग में वह दृश्य कौंध गया, जब कक्षा की पिकनिक के दौरान नौका विहार करते हुए सरोज ने एक फिल्मी गीत गाया था, ‘तुमसे आया न गया, हमसे बुलाया न गया…’

‘तुमने इनका परिचय नहीं दिया।’ कपिल ने बुजुर्ग महिला की ओर संकेत करते हुए कहा।

‘इन्हें नहीं जानते? ‘ये मेरी माँ हैं।

कपिल ने हाथ जोड़ अभिवादन किया

‘अब भी सिगरेट पीते हो?’

‘पहले की तरह नहीं। कभी-कभी।’

सरोज ने विदेशी सिगरेट का पैकेट और एक लाइटर उसे भेंट किया, ‘तुम्हारे लिये खरीदा था यह लाइटर। कोई दस साल पहले। इस बार भारत आई तो लेती आई।’

‘क्या विदेश में रहती हो? ‘कपिल ने लाइटर को उलट-पुलट कर देखते हुए पूछा।

‘हाँ, मॉन्ट्रियल में, मेरे पति भी तुम्हारे ही पेशे में है।’

‘कनाडा के लीडिंग लॉयर।’ सरोज की माँ ने जोड़ा।

‘लगता है तुम्हारी जिन्दगी में वकील ही लिखा था।’ कपिल के मुँह से अनायास ही निकल गया।

सरोज ने अपने पति की तस्वीर दिखायी। एक खूबसूरत शख्स की तस्वीर थी। चेहरे से लगता था कि कोई वकील है या न्यायमूर्ति। कपिल भी कम सुदर्शन नहीं था, मगर उसे लगा, वह उसके पति से उन्नीस ही है।

उसने फोटो लौटाते हुए कहा, ‘तुम्हारे पति भी आये हैं?’

‘नहीं, उन्हें फुर्सत ही कहाँ?’ सरोज बोली, ‘बाल की खाल न उतारने लगो, इसीलिए बताना जरूरी है कि मैं उनके साथ बहुत खुश हूँ। आई एम हैप्पिली मैरिड।’

तभी कपिल का पोता आँखे मलता हुआ नमूदार हुआ और सीधा उसकी गोद में आ बैठा।

‘मेरा पोता है।’ आजकल बहू आयी हुई है। कपिल ने बताया।

‘बहुत प्यारा बच्चा है, क्या नाम है?’

‘बंटू।’ बंटू ने नाम बता कर अपना चेहरा छिपा लिया।

‘बंटू बेटे, हमारे पास आओ, चॉकलेट खाओगे?’

‘खाएँगे।’ उसने कहा और चॉकलेट का पैकेट मिलते ही अपनी माँ को दिखाने दौड़ पड़ा।

‘कोर्ट कब जाते हो?’ उसने पूछा।

‘तुम इतने साल बाद मिली हो। आज नहीं जाँऊगा, आज तो तुम्हारा कोर्टमार्शल होगा।’

‘मैंने क्या गुनाह किया है? ‘सरोज ने कहा, ‘गुनाहों के देवता तो तुम पढ़ा करते थे, तुम्हीं जानो। अच्छा, यह बताओ जब मेरी दीदी की शादी हो रही थी तो तुम दूर खड़े रो क्यों रहे थे?’

कपिल सहसा इस हमले के लिये तैयार न था, वह अचकचा कर रह गया,

‘अरे! कहाँ से कुरेद लाई हो इतनी सूचनाएँ और वह भी इतने वर्षों बाद। तुम्हारी स्मृति की दाद देता हूँ। तीस साल पहले की घटनाएँ ऐसे बयान कर रही हो जैसे कल की बात हो।’

‘यह याद करके तो आज भी गुदगुदी हो जाती है कि तुम रोते हुए कह रहे थे कि एक दिन सरोज की भी डोली उठ जायेगी और तुम हाथ मलते रह जाओगे। अच्छा यह बताओ कि तुम कहाँ थे जब मेरी डोली उठी थी?’

‘कम ऑन सरोज। कपिल सिर्फ इतना कह पाया। मगर यह सच था कि सरोज की दीदी की शादी में वह जी भर कर रोया था।’

‘यह बताओ, बेटे कि सरोज को इतना ही चाहते थे तो कभी बताया क्यों नहीं उसे?’ सरोज की माँ ने चुटकी ली।

‘खत लिखा तो था।’ कपिल ने ठहाका लगाया, ‘इसने जवाब ही नहीं दिया।’

‘खत तो इसने उसी दिन मेरे हवाले कर दिया था,’ सरोज की माँ ने बताया, ‘जब तक रिश्ता तय नहीं हुआ था, बीच-बीच में मुझसे माँग-माँग कर तुम्हारा खत पढ़ा करती थी।’

‘मेरे लिए बहुत स्पेशल है यह खत। जिन्दगी का पहला और आखिरी खत। शादी को इतने बरस हो गये, मेरे पति ने कभी पत्र तक नहीं लिखा, प्रेमपत्र क्यों लिखेंगे? वह मोबाइल कल्चर के आदमी हैं। हमारे घर में सभी ने पढ़ा है यह प्रेमपत्र। यहाँ तक कि मेरे पति मेरी बेटियों तक को सुना चुके हैं यह पत्र। मेरे पति ने कहा था कि इस बार अपने बॉयफ्रेंड से मिल कर आना।’

‘इसका मतलब है, पिछले तीस बरस से तुम सपरिवार मेरी मुहब्बत का मजाक उड़ाती रही हो।’

‘यह भाव होता तो मैं क्यों आती तीस बरस बाद तुमसे मिलने! अच्छा इन तीस बरसों में तुमने मुझे कितनी बार याद किया?’

सच तो यह था कि पिछले तीस बरसों में कपिल को सरोज की याद आई ही नहीं थी। अपने पत्र का उत्तर न पा कर कुछ दिन दारू के नशे में शायद मित्रों के संग गुनगुनाता रहा था, ‘जब छोड़ दिया रिश्ता तेरी जुल्फेस्याह का, अब सैकड़ों बल खाया करे, मेरी बला से।’ और देखते-देखते इस प्रसंग के प्रति उदासीन हो गया था।

‘तुम्हारा सामान कहाँ है?’ कपिल ने अचानक चुप्पी तोड़ते हुए पूछा।

‘बाहर टैक्सी में। सोचा था नहीं पहचानोगे, तो इसी से चंडीगढ लौट जाएँगे।’

‘आज दिल्ली में ही रुको। शाम को कमानी में मंजुला का कन्सर्ट है। आज तुम लोगों के बहाने मैं भी सुन लूँगा। दोपहर को पिकनिक का कार्यक्रम रखते हैं। सूरजकुंड चलेंगे और बहू को भी घुमा लायेगे। फिर मुझे तुम्हारी आवाज में वह भी तो सुनना है, तुमसे आया न गया, हमसे बुलाया न गया याद है या भूल गयी हो?’

सरोज मुस्कराई, ‘कमबख्त याददाश्त ही तो कमजोर नहीं है।’

कपिल ने गोपाल से सरोज का सामान नीचे वाले बेडरूम में लगाने को कहा। बाहर कोयल कूक रही थी।

‘क्या कोयल भी अपने साथ लायी हो?’

‘कोयल तो तुम्हारे ही पेड़ की है।’

‘यकीन मानो, मैंने तीस साल बाद यह कूक सुनी है।’ कपिल शर्मिन्दा होते हुए फलसफाना अंदाज में फुसफुसाया, ‘यकीन नहीं होता, मैं वही कपिल हूँ जिससे तुम मिलने आई हो और मुद्दत से जानती हो। कुछ देर पहले तुमसे मिल कर लग रहा था वह कपिल कोई दूसरा था जिसने तुम्हें खत लिखा था…’

‘टेक इट ईजी, मैन’ सरोज उठते हुए बोली, ज्यादा फिलॉसफी मत बघारो। यह बताओ टॉयलेट किधर है?’

कोयल ने आसमान सिर पर उठा लिया था।




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ravindranath best story in hindi

Nai roshani ravindranath tagore story in hindi

  Contents 

1.1 Ravindranath tagore ka jivan parichay

1.2 Ravindranath tagore story nai roshani                                         

 

Ravindranath tagore ka jivan parichay

रविंद्रनाथ टैगोर मूलतः बांग्ला भाषा के साहित्यकार हैं। रविंद्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता में हुआ। आपने उपन्यास, कहानी, नाटक, कविता, संस्मरण आदि विधाओं की रचना की 1913 में गीतांजलि रचना के लिए रवींद्रनाथ टैगोर को नाबेल पुरुष्कार से सम्मानित किया किया गया। रवींद्रनाथ टैगोर को नाबेल प्राप्त करने वाले पहले भारतीय होने का गौरव प्राप्त हुआ। लोग उन्हें प्यार से गुरुदेव के नाम से पुकारते थे। रविंद्रनाथ का निधन 7 अगस्त 1942 को हुआ। रविंद्रनाथ टैगोर की प्रसिद्ध कहानी नई रोशनी यहां पर शेयर कर रहे हैं।

Nai roshani ravindranath tagore story in hindi

नई रोशनी रवींद्रनाथ टैगोर स्टोरी
बाबू अनाथ बन्धु बी.ए. में पढ़ते थे। परन्तु कई वर्षों से निरन्तर फेल हो रहे थे। उनके सम्बन्धियों का विचार था कि वह इस वर्ष अवश्य उत्तीर्ण हो जाएंगे, पर इस वर्ष उन्होंने परीक्षा देना ही उचित न समझा।
इसी वर्ष बाबू अनाथ बन्धु का विवाह हुआ था। भगवान की कृपा से वधू सुन्दर सद्चरित्रा मिली थी। उसका नाम विन्ध्यवासिनी था। किन्तु अनाथ बाबू को इस हिंदुस्तानी नाम से घृणा थी। पत्नी को भी वह विशेषताओं और सुन्दरता में अपने योग्य न समझते थे।
परन्तु विन्ध्यवासिनी के हृदय में हर्ष की सीमा न थी। दूसरे पुरुषों की अपेक्षा वह अपने पति को सर्वोत्तम समझती थी। ऐसा मालूम होता था कि किसी धर्म में आस्था रखने वाले श्रध्दालु व्यक्ति की भांति वह अपने हृदय के सिंहासन पर स्वामी की मूर्ति सजाकर सर्वदा उसी की पूजा किया करती थी।
इधर अनाथ बन्धु की सुनिये! वह न जाने क्यों हर समय उससे रुष्ट रहते और तीखे-कड़वे शब्दों से उसके प्रेम-भरे मन को हर सम्भव ढंग पर जख्मी करते रहते। अपनी मित्र-मंडली में भी वह उस बेचारी को घृणा के साथ स्मरण करते।
जिन दिनों अनाथ बन्धु कॉलेज में पढ़ते थे उनका निवास ससुराल में ही था। परीक्षा का समय आया, किन्तु उन्होंने परीक्षा दिये बगैर ही कॉलेज छोड़ दिया। इस घटना पर अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा विन्ध्यवासिनी को अधिक दु:ख हुआ। रात के समय उसने विनम्रता के साथ कहना आरम्भ किया-”प्राणनाथ! आपने पढ़ना क्यों छोड़ दिया? थोड़े दिनों का कष्ट सह लेना कोई कठिन बात न थी। पढ़ना-लिखना कोई बुरी बात तो नहीं है।”
पत्नी की इतनी बात सुनकर अनाथ बन्धु के मिजाज का पारा 120 डिग्री तक पहुंच गया। बिगड़कर कहने लगे- ”पढ़ने-लिखने से क्या मनुष्य के चार हाथ-पांव हो जाते हैं? जो व्यक्ति पढ़-लिखकर अपना स्वास्थ्य खो बैठते हैं उनकी दशा अन्त में बहुत बुरी होती है।”
पति का उत्तर सुनकर विन्ध्यवासिनी ने इस प्रकार स्वयं को सांत्वना दी जो मनुष्य गधे या बैल की भांति कठिन परिश्रम करके किसी-न-किसी प्रकार सफल भी हो गये, परन्तु कुछ न बन सके तो फिर उनका सफल होना-न-होना बराबर है।
इसके दूसरे दिन पड़ोस में रहने वाली सहेली कमला विन्ध्यवासिनी को एक समाचार सुनाने आई। उसने कहा- ”आज हमारे भाई बी.ए. की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये। उनको बहुत कठिन परिश्रम करना पड़ा, किन्तु भगवान की कृपा से परिश्रम सफल हुआ।”
कमला की बात सुनकर विन्ध्य ने समझा कि पति की हंसी उड़ाने को कह रही है। वह सहन कर गई और दबी आवाज से कहने लगी-”बहन, मनुष्य के लिए बी.ए. पास कर लेना कोई कठिन बात नहीं परन्तु बी.ए. पास कर लेने से होता क्या है? विदेशों में लोग बी.ए. और एम.ए. पास व्यक्तियों को घृणा की दृष्टि से देखते हैं।”
2
विन्ध्यवासिनी ने जो बातें कमला से कही थीं वे सब उसने अपने पति से सुनी थीं, नहीं तो उस बेचारी को विलायत का हाल क्या मालूम था। कमला आई तो थी हर्ष का समाचार सुनाने, किन्तु अपनी प्रिय सहेली के मुख से ऐसे शब्द सुनकर उसको बहुत दु:ख हुआ। परन्तु समझदार लड़की थी। उसने अपने हृदयगत भाव प्रकट न होने दिए। उल्टा विनम्र होकर बोली- ”बहन, मेरा भाई तो विलायत गया ही नहीं और न मेरा विवाह ऐसे व्यक्ति से हुआ है जो विलायत होकर आया हो, इसलिए विलायत का हाल मुझे कैसे मालूम हो सकता है?”
इतना कहकर कमला अपने घर चली गई।
किन्तु कमला का विनम्र स्वर होते हुए भी ये बातें विन्ध्य को अत्यन्त कटु प्रतीत हुईं। वह उनका उत्तर तो क्या देती, हां एकान्त में बैठकर रोने लगी।
इसके कुछ दिनों पश्चात् एक अजीब घटना घटित हुई जो विशेषत: वर्णन करने योग्य है। कलकत्ता से एक धनवान व्यक्ति जो विन्ध्य के पिता राजकुमार के मित्र थे, अपने कुटुम्ब-सहित आये और राजकुमार बाबू के घर अतिथि बनकर रहने लगे। चूंकि उनके साथ कई आदमी और नौकर-चाकर थे इसलिए जगह बनाने को राजकुमार बाबू ने अनाथ बन्धु वाला कमरा भी उनको सौंप दिया और अनाथ बन्धु के लिए एक और छोटा-सा कमरा साफ कर दिया। यह बात अनाथ बन्धु को बहुत बुरी लगी। तीव्र क्रोध की दशा में वह विन्ध्यवासिनी के पास गये और ससुराल की बुराई करने लगे, साथ-ही-साथ उस निरपराधिनी को दो-चार बातें सुनाईं।
विन्ध्य बहुत व्याकुल और चिन्तित हुई किन्तु वह मूर्ख न थी। उसके लिए अपने पिता को दोषी ठहराना योग्य न था किन्तु पति को कह-सुनकर ठण्डा
किया। इसके बाद एक दिन अवसर पाकर उसने पति से कहा कि- ”अब यहां रहना ठीक नहीं। आप मुझे अपने घर ले चलिये। इस स्थान पर रहने में सम्मान नहीं है।”
अनाथ बन्धु परले सिरे के घमण्डी व्यक्ति थे। उनमें दूरदर्शिता की भावना बहुत कम थी। अपने घर पर कष्ट से रहने की अपेक्षा उन्होंने ससुराल का अपमान सहना अच्छा समझा, इसलिए आना-कानी करने लगे। किन्तु विन्ध्यवासिनी ने न माना और कहने लगी- ”यदि आप जाना नहीं चाहते तो मुझे अकेली भेज दीजिये। कम-से-कम मैं ऐसा अपमान सहन नहीं कर सकती।”
इस पर अनाथ बन्धु विवश हो घर जाने को तैयार हो गये।
3
चलते समय माता-पिता ने विन्ध्य से कुछ दिनों और रहने के लिए कहा किन्तु विन्ध्य ने कुछ उत्तर न दिया। यह देखकर माता-पिता के हृदय में शंका हुई। उन्होंने कहा-”बेटी विन्ध्य! यदि हमसे कोई ऐसी वैसी बात हुई हो तो उसे भुला देना।”
बेटी ने नम्रतापूर्वक पिता के मुंह की ओर देखा। फिर कहने लगी- ”पिताजी! हम आपके ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकते। हमारे दिन सुख से बीते और…।”
कहते-कहते विन्ध्य का गला भर आया, आंखों से आंसू से बहने लगे। इसके पश्चात् उसने हाथ जोड़कर माता-पिता से विदा चाही और सबको रोता हुआ छोड़कर पति के साथ चल दी।
कलकत्ता के धनवान और ग्रामीण जमींदारों में बहुत बड़ा अन्तर है। जो व्यक्ति सर्वदा नगर में रहा हो उसे गांव में रहना अच्छा नहीं लगता। किन्तु विन्ध्य ने पहली बार नगर से बाहर कदम रखने पर भी किसी प्रकार का कष्ट प्रकट न किया बल्कि ससुराल में हर प्रकार से प्रसन्न रहने लगी। इतना ही नहीं, उसने अपनी नारी-सुलभ-चतुरता से बहुत शीघ्र अपनी सास का मन मोह लिया। ग्रामीण स्त्रियां उसके गुणों को देखकर प्रसन्न होती थीं, परन्तु सब-कुछ होते हुए भी विन्ध्य प्रसन्न न थी। अनाथ बन्धु के तीन भाई और थे। दो छोटे एक बड़ा। बड़े भाई परदेश में पचास रुपये के नौकर थे। इससे अनाथ बन्धु के घर-बार का खर्च चलता था। छोटे भाई अभी स्कूल में पढ़ते थे।
बड़े भाई की पत्नी श्यामा को इस बात का घमण्ड था कि उसके पति की कमाई से सबको रोटी मिलती है, इसलिए वह घर के कामकाज को हाथ तक न लगाती थी।
इसके कुछ दिनों पश्चात् बड़े भाई छुट्टी लेकर घर आये। रात को श्यामा ने पति से भाई और भौजाई की शिकायत की। पहले तो पति ने उसकी बातों को हंसी में उड़ा दिया, परन्तु जब उसने कई बार कहा तो उन्होंने अनाथ बन्धु को बुलाया और कहने लगे-”भाई, पचास रुपये में हम सबका गृहस्थ नहीं चल सकता, अब तुमको भी नौकरी की चिन्ता करनी चाहिए।”
यह शब्द उन्होंने बड़े प्यार से कहे थे परन्तु अनाथ बन्धु बिगड़कर बोले- ”भाई साहब! दो मुट्ठी-भर अन्न के लिए आप इतने रुष्ट होते हैं, नौकरी तलाश करना कोई बड़ी बात नहीं, किन्तु हमसे किसी की गुलामी नहीं हो सकती।” इतना कहकर वह भाई के पास से चले आये।
इन्हीं दिनों गांव के स्कूल में थर्ड मास्टर का स्थान खाली हुआ था। अनाथ बन्धु की पत्नी और उनके बड़े भाई ने उस स्थान पर उनसे काम करने के लिए बहुत कहा, किन्तु उन्होंने ऐसी तुच्छ नौकरी स्वीकार न की। अब तो अनाथ बन्धु को केवल विलायत जाने की धुन समाई हुई थी। एक दिन अपनी पत्नी से कहने लगे- ”देखो, आजकल विलायत गये बिना मनुष्य का सम्मान नहीं होता और न अच्छी नौकरी मिल सकती है। इसलिए हमारा विलायत जाना आवश्यक है। तुम अपने पिता से कहकर कुछ रुपया मंगा दो तो हम चले जाएं।”
विलायत जाने की बात सुनकर विन्ध्य को बहुत दु:ख हुआ, पिता के घर से रुपया मंगाने की बात से बेचारी की जान ही निकल गई।
4
दुर्गा-पूजा के दिन समीप आये तो विन्ध्य के पिता ने बेटी और दामाद को बुलाने के लिए आदमी भेजा। विन्ध्य खुशी-खुशी मैके आई। मां ने बेटी और दामाद को रहने के लिए अपना कमरा दे दिया। दुर्गा-पूजा की रात को यह सोचकर कि पति न जाने कब वापस आएं, विन्ध्य प्रतीक्षा करते-करते सो गई।
सुबह उठी तो उसने अनाथ बन्धु को कमरे में न पाया। उठकर देखा तो मां का लोहे का सन्दूक खुला पड़ा था, सारी चीजें इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं और पिता का छोटा कैश-बाक्स जो उसके अन्दर रखा था, गायब था।
विन्ध्य का हृदय धड़कने लगा। उसने सोचा कि जिस बदमाश ने चोरी की है उसी के हाथों पति को भी हानि पहुंची है।
परन्तु थोड़ी देर बार उसकी दृष्टि एक कागज के टुकड़े पर जा पड़ी। वह उठाने लगी तो देखा कि पास ही कुंजियों का एक गुच्छा पड़ा है। पत्र पढ़ने से मालूम हुआ कि उसका पति आज ही प्रात: जहाज पर सवार होकर विलायत चला गया है।
पत्र पढ़ते ही विन्ध्य की आंखों के सामने अन्धेरा छा गया।
वह दु:ख के आघात से जमीन पर बैठ गई और आंचल से मुंह ढांपकर रोने लगी।
आज सारे बंगाल में खुशियां मनाई जा रही थीं किन्तु विन्ध्य के कमरे का दरवाजा अब तक बन्द था। इसका कारण जानने के लिए विन्ध्य की सहेली कमला ने दरवाजा खटखटाना आरम्भ किया, किन्तु अन्दर से कोई उत्तर न मिला तो वह दौड़कर विन्ध्य की मां को बुला लाई। मां ने बाहर खड़ी होकर आवाज दी- ”विन्ध्य! अन्दर क्या कर रही है? दरवाजा तो खोल बेटी!”
मां की आवाज पहचानकर विन्ध्य ने झट आंसुओं को पोंछ डाला और कहा-”माताजी! पिताजी को बुला लो।”
इससे मां बहुत घबराई, अत: उसने तुरन्त पति को बुलवाया। राजकुमार बाबू के आने पर विन्ध्य ने दरवाजा खोल दिया और माता-पिता को अन्दर बुलाकर फिर दरवाजा बंद कर लिया।
राजकुमार ने घबराकर पूछा- ”विन्ध्य, क्या बात है? तू रो क्यों रही है?”
यह सुनते ही विन्ध्य पिता के चरणों में गिर पड़ी और कहने लगी- ”पिताजी! मेरी दशा पर दया करो। मैंने आपका रुपया चुराया है।”
राजकुमार आश्चर्य-चकित रह गये। उसी हालत में विन्ध्य ने फिर हाथ जोड़कर कहा-”पिताजी, इस अभागिन का अपराध क्षमा कीजिए। स्वामी को विलायत भेजने के लिए मैंने यह नीच कर्म किया है।’
अब राजकुमार को बहुत क्रोध आया। डांटकर बोला- ”दुष्ट लड़की, यदि तुझको रुपये की आवश्यकता थी तो हमसे क्यों न कहा?”
विन्ध्य ने डरते-डरते उत्तर दिया-”पिताजी! आप उनको विलायत जाने के लिए रुपया न देते।”
ध्यान देने योग्य बात है कि जिस विन्ध्य ने कभी माता-पिता से रुपये पैसे के लिए विनती तक न की थी आज वह पति के पाप को छिपाने के लिए चोरी का इल्जाम अपने ऊपर ले रही है।
विन्ध्यवासिनी पर चारों ओर से घृणा की बौछारें होने लगीं। बेचारी सब-कुछ सुनती रही, किन्तु मौन थी।
तीव्र क्रोधावेश की दशा में राजकुमार ने बेटी को ससुराल भेज दिया।
5
इसके बाद समय बीतता गया, किन्तु अनाथ बंधु ने विन्ध्य को कोई पत्र न लिखा और न अपनी मां की ही कोई सुधबुध ली। पर जब आखिरकार सब रुपये, जो उनके पास थे खर्च हो गये तो बहुत ही घबराये और विन्ध्य के पास एक तार भेजकर तकाजा किया। विन्ध्य ने तार पाते ही अपने बहुमूल्य आभूषण बेच डाले और उनसे जो मिला वह अनाथ बाबू को भेज दिया। अब क्या था? जब कभी रुपयों की आवश्यकता होती वह झट विन्ध्य को लिख देते और विन्ध्य से जिस तरह बन पड़ता, अपने रहे-सहे आभूषण बेचकर उनकी आवश्यकताओं को पूरा करती रहती। यहां तक कि बेचारी गरीब के पास कांच की दो चूड़ियों के सिवाय कुछ भी शेष न रहा।
अब अभागी विन्ध्य के लिए संसार में कोई सुख शेष न रहा था। सम्भव था वह किसी दिन दुखी हालत में आत्महत्या कर लेती। किन्तु वह सोचती कि मैं स्वतंत्र नहीं, अनाथ बन्धु मेरे स्वामी हैं। इसलिए कष्ट सहते हुए भी वह जीवन के दु:ख उठाने पर विवश थी। अनाथ बन्धु के लिए वह जीवित रहकर अपना
कर्त्तव्य पूरा कर रही थी किन्तु अब चूंकि उसके लिए विरह का दु:ख सहना
कठिन हो गया था इसलिए विवश होकर उसने पति के नाम वापस आने के लिए पत्र लिखा।
इसके थोड़े दिनों बाद अनाथ बन्धु बैरिस्टरी पास करके साहब बहादुर बने हुए वापस लौट आये परन्तु देहात में बैरिस्टर साहब का निर्वाह होना कठिन था इसलिए पास ही एक कस्बे में होटल का आश्रय लेना पड़ा। विलायत में रहकर अनाथ बन्धु के रहन-सहन में बहुत अन्तर आ गया था। वह ग्रामीणों से घृणा करते थे। उनके खान-पान और रहन-सहन के तरीकों से यह भी मालूम न होता था कि वह अंग्रेज हैं या हिंदुस्तानी।
विन्ध्य यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुई कि स्वामी बैरिस्टर होकर आये हैं, किंतु मां उसकी बिगड़ी हुई आदतों को देखकर बहुत व्याकुल हुई। अंत में उसने भी यह सोचकर दिल को समझा लिया कि आजकल का जमाना ही ऐसा है, इसमें अनाथ बन्धु का क्या दोष?
इसके कुछ समय पश्चात् एक बहुत ही दर्द से भरी घटना घटित हुई। बाबू राजकुमार अपने कुटुम्ब-सहित नाव पर सवार होकर कहीं जा रहे थे कि सहसा नौका जहाज से टकराकर गंगा में डूब गई। राजकुमार तो किसी प्रकार बच गये किन्तु उनकी पत्नी और पुत्र का कहीं पता न लगा।
अब उनके कुटुम्ब में विन्ध्य के सिवाय कोई दूसरा शेष न रहा था। इस दुर्घटना के पश्चात् एक दिन राजकुमार बाबू विकल अवस्था में अनाथ बन्धु से मिलने आये। दोनों में कुछ देर तक बातचीत होती रही, अन्त में राजकुमार ने कहा- ”जो कुछ होना था सो तो हुआ, अब प्रायश्चित करके अपनी जाति में सम्मिलित हो जाना चाहिए। क्योंकि तुम्हारे सिवाय अब दुनिया में हमारा कोई नहीं, बेटा या दामाद जो कुछ भी हो, अब तुम हो।”
6
अनाथ बन्धु ने प्रायश्चित करना स्वीकार कर लिया। पंडितों से सलाह ली गई तो उन्होंने कहा- ”यदि इन्होंने विलायत में रहकर मांस नहीं खाया है तो इनकी शुध्दि वेद-मन्त्रों द्वारा की जा सकती है।”
यह समाचार सुनकर विन्ध्य हर्ष से फूली न समाई और अपना सारा दु:ख भूल गई। आखिर एक दिन प्रायश्चित की रस्म अदा करने के लिए निश्चित किया गया।
बड़े आनन्द का समय था, चहुंओर वेद-मन्त्रों की गूंज सुनाई देती थी। प्रायश्चित के पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन कराया गया और इसके परिणामस्वरूप बाबू अनाथ बन्धु नए सिरे से बिरादरी में सम्मिलित कर लिये गये।
परन्तु ठीक उसी समय राजकुमार बाबू ब्राह्मणों को दक्षिणा दे रहे थे, एक नौकर ने कार्ड लिये हुए घर में प्रवेश किया और राजकुमार से कहने लगा- ”बाबू जी! एक मेम आई हैं।”
मेम का नाम सुनते ही राजकुमार बाबू चकराए, कार्ड पढ़ा। उस पर लिखा था-”मिसेज अनाथ बन्धु सरकार।”
इससे पहले कि राजकुमार बाबू हां या न में कुछ उत्तर देते एक गोरे रंग की यूरोपियन युवती खट-खट करती अन्दर आ उपस्थित हुई।
पंडितों ने उसको देखा, तो दक्षिणा लेनी भूल गये। घबराकर जिधर जिसके सींग समाये निकल गये। इधर मेम साहिबा ने जब अनाथ बन्धु को न देखा तो बहुत विकल हुई और उनका नाम ले-लेकर आवाजें देने लगी।
इतने में अनाथ बन्धु कमरे से बाहर निकले। उन्हें देखते ही मेम साहिबा ‘माई डीयर’ कहकर झट उनसे लिपट गई।
यह दशा देखकर घर के पुरोहित भी अपना बोरिया-बंधना संभाल कर विदा हो गये। उन्होंने पीछे मुड़कर भी न देखा।

Rahim ke dohe

Rahim ke dohe

 Contents

1.1 rahim ka jivan prichay

1.2 rahim ke prasiddh dohe

Rahim ke dohe
रहीम हिंदी काव्य एक प्रसिद्ध कवि हैं। उन्होंने अपने दोहों के माध्यम से जनजाग्रति का कार्य किया। रहीम का पूरा नाम अब्दुल रहीम खाने खानाँ था। मुस्लिम होते हुए भी उन्होंने हिन्दू धर्म को भी अन्तर्मन की गहराई से स्वीकारा था इसकी झलक उनके साहित्य में देखने को मिलती है। उन्होंने अपने कई दोहों में हिन्दू देवी देवताओं का उदाहरण प्रस्तुत किया है। रहीम जी हिन्दू मुस्लिम भाई चारे की एक कड़ी थे। उनके दोहों में असामान्य ज्ञान और गहरे व्यवहारिक अनुभव का सुंदर संगम देखने को मिलता है। आज हम रहीम के प्रसिद्ध दोहे आपके साथ शेयर कर रहे हैं।

रहीम के प्रसिद्ध दोहे
Rahim ke prasidh dohe

1.
 
चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछू न चाहिये, वे साहन के साह।। 1 
 
2.
छिमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात।
का रहिमन हरि को घट्यो, जो भृगु मारी लात।।2
3.
जे गरीब पर हित करें, ते रहीम बढ़ लोग।
कहाँ सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग।।3
4.
जैसी जाकी बुद्धि है, तैसी कहै बनाय।
ताको बुरा न मानिये, लेन कहाँ सो जाय।।4
5.
जो बड़ेन को लघु कहें, नहीं रहीम घटि जाँहि।
गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहीं।।5
6.
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग।।
Rahim ke dohe
रहीम के दोहे

 

 
7.
जो रहीम ओछो बढे, तौं अति ही इतराय।
प्यादे सो फरजी भयो, टेड़ों टेड़ों जाय।।7
8.
जो रहीम ओछो बढ़ै, तौ अति ही इतराय ।
प्‍यादे सों फरजी भयो, टेढ़ों टेढ़ो जाय ।।
9.
देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन रैन ।
लोग भरम हम पै धरें, याते नीचे नैन ।।9
10.
फरजी सह न ह्य सकै, गति टेढ़ी तासीर ।
रहिमन सीधे चालसों, प्‍यादो होत वजीर ।।10
11.
बड़े बड़ाई ना करैं, बड़ो न बोलैं बोल ।
रहिमन हीरा कब कहै, लाख टका मेरो मोल ।।11
12.
बड़े बड़ाई नहिं तजैं, लघु रहीम इतराइ ।
राइ करौंदा होत है, कटहर होत न राइ ।।12
13.
बड़े पेट के भरन को, है रहीम दुख बा‍ढ़ि ।
यातें हाथी हहरि कै, दयो दाँत द्वै का‍ढ़ि ।।13
14.
बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय ।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय ।।14
15.
बिपति भए धन ना रहे, रहे जो लाख करोर ।
नभ तारे छिपि जात हैं, ज्‍यों रहीम भए भोर ।।15
16.
भूप गनत लघु गुनिन को, गुनी गनत लघु भूप ।
रहिमन गिर तें भूमि लौं, लखों तो एकै रूप ।।16
17.
मान सहित विष खाय के, संभु भये जगदीस।
बिना मान अमृत पिये, राहु कटायो सीस ।।17
18.
यह रहीम निज संग लै, जनमत जगत न कोय ।
बैर, प्रीति, अभ्‍यास, जस, होत होत ही होय ।।18
19.
रहिमन उजली प्रकृत को, नहीं नीच को संग ।
करिया बासन कर गहे, कालिख लागत अंग ।।19
20.
रहिमन कठिन चितान ते, चिंता को चित चेत ।
चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत ।।20
21.
रहिमन ओछे नरन सों, बैर भलो ना प्रीति ।
काटे चाटै स्‍वान के, दोऊ भाँति विपरीति ।।21
22.
रहिमन तीर की चोट ते, चोट परे बचि जाय ।
नैन बान की चोट ते, चोट परे मरि जाय ।।22
23.
रहिमन दुरदिन के परे, बड़ेन किए घटि काज ।
पाँच रूप पांडव भए, रथवाहक नल राज ।।23
24.
रहिमन थोरे दिनन को, कौन करे मुँह स्‍याह ।
नहीं छलन को परतिया, नहीं करन को ब्‍याह ।।24
25.
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि ।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि ।।25
26.
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय ।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय ।।26
27.
रहिमन धोखे भाव से, मुख से निकसे राम ।
पावत पूरन परम गति, कामादिक को धाम ।।27
28.
रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून ।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून ।।28
29.
रहिमन बिपदाहू भली, जो थोरे दिन होय ।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय ।।29
30.
वे रहीम नर धन्‍य हैं, पर उपकारी अंग ।
बाँटनेवारे को लगे, ज्‍यों मेंहदी को रंग ।।30
31.
समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जाय ।
सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछिताय ।।31
32.
समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक ।
चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक ।।32
33.
खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान ।
रहिमन दाबे ना दबैं, जानत सकल जहान ।।33
34.
जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय ।
बारे उजियारो लगे, बढ़े अँधेरो होय ।।34
35.
थोथे बादर क्वाँर के, ज्‍यों रहीम घहरात ।
धनी पुरुष निर्धन भये, करै पाछिली बात ।।35
36.
अब रहीम मुश्किल पड़ी, गाढ़े दोऊ काम।
साँचे से तो जग नहीं, झूठे मिलैं न राम ।।36
37.
करम हीन रहिमन लखो, धँसो बड़े घर चोर ।
चिंतत ही बड़ लाभ के, जागत ह्वै गौ भोर ।।37
38.
कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत ।
बिपति कसौटी जे कसे, ते ही साँचे मीत ।।38
39.
संत संपति जानि कै, सब को सब कुछ देत ।
दीनबंधु बिनु दीन की, को रहीम सुधि लेत ।।39
40.
रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय ।
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय ।।40
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khush kaise rahe tips

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प्रत्येक व्यक्ति यही चाहता है कि वो जीवन में खुश रहे। उसको  लगता है कि यदि मेरे पास बहुत सारा रुपया आ जयेगा तो मैं खुश रहूँगा। रुपया कमाने के लिए व्यक्ति कड़ी मेहनत करता है और finally रुपया कमा भी लेता है । क्या रूपये से उसको ख़ुशी मिलती है शायद नही? रुपए से भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है पर आप खुश रहेंगे इसकी गारन्टी नही है। ख़ुशी की तलाश हर इंसान को है पर चंद लोग ही अपने जीवन में हमेशा खुश रह पाते हैं।

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        आप किसी छोटे बच्चे को देखिये कितना खुश रहता है और उसकी जो मुस्कान है न वो वास्तविक मुस्कान है जो कि हमेशा होनी चाहिए । पर क्या ऐसा होता है ? नही क्योंकि जैसे ही वो बच्चा बढ़ा होता आसपास का माहौल और समाज उसमे भय पैदा करता है। नाकामी का भय fail हो जाने का भय आर्थिक रूप से कमजोर होने का भय बीमारी का भय आदि का भय व्यक्ति के अंदर इतना भर दिया जाता है कि उसकी मुस्कान कहीं खो जाती है वह इतने डिस्प्रेशन में चला जाता है कि खुश होना ही भूल जाता है।

           आज हम आपके लिए कुछ बेस्ट khush rhne ke tips लेकर आये हैं।

  • Negative लोगो से दूर रहें :-  यदि आप सच में खुश रहना चाहते हैं तो आपको ऐसे लोगो से दूर रहना होगा जो negative सोच वाले हैं। ये लोग आपको भी negative सोचने पर मजबूर कर देते हैं। जिसके के परिणाम स्वरूप हीनता , उत्साह में कमी और अवसाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। आप कोई भी कार्य नहि कर सकते क्योंकि negative सोच वाले आपको ये यकीन दिला देते हैं कि आप उस कार्य में सफल नही हो सकते। 
            इसलिए यदि आपको खुश रहना है तो ऐसे लोगो से दोस्ती करें जो positive सोच वाले हो । ताकि आपके चारो और का वातारण खुशनुमा बना रहे। जब आपके चारों और जो व्यक्ति हैं जिनसे आप बात करते हैं , अपनी समस्याओं को discuss  करते हैं वो आपको एक सकारात्मक सलाह देंते हैं जिससे आप positive aur happy feel करते हैं।
         यदि आप चाहें तो उक्त बातों को अजमा कर देख सकते हैं। मानलो कि आपको किसी compitition exam  की तैयारी करनी है और उसके बारे में किसी व्यक्ति से सलाह लेनी है। जब आप सलाह लोगे तो दो तरह की सलाह आपको मिल सकती हैं।
       पहली सलाह ये हो सकती है कि सामने वाला व्यक्ति आपको बोलेगा कि वह compitition exam बहुत कठिन है अच्छे अच्छे नही निकाल पाये साथ में जो नही निकल पाये उनके नाम भी बता सकता है। उसकी सलाह से आप भी यह सोचने लगेगे कि आप exam नही निकाल पाएंगे। ऐसे लोग negative सोच वाले व्यक्ति कहलाते हैं।

      दूसरी सलाह ये हो सकती है कि सामने वाला व्यक्ति आपको वोले कि यदि तुम कड़ी मेहनत करोगे तो exam निकाल सकते हो साथ ही वो कुछ ऐसे लोगो के नाम भी बता सकता है जिन्होंने उस exam को पास किया है। उसकी सलाह है से आपका जोश और भी बढ़ जयेगा और आप अच्छा महसूस करेंगे। ऐसे लोग positive सोच वाले व्यक्ति कहलाते हैं।

      अब आपको decide  करना है कि आप कैसे लोगो के साथ रहना पसंद करोगे।

  • हमेशा कुछ नया सीखते रहें :-  आप अच्छी बुक पढ़कर और youtube पर ज्ञानवर्धक video देखकर रोज कुछ नया सीख सकते हैं। जिससे आपको आंतरिक ख़ुशी का अहसास होगा और जो फालतू के विचार आते हैं उनसे भी छुटकारा मिल जायेगा। अपने खाली समय में कुछ नया सीखते रहें।
  • सुबह जल्दी उठें :- आप सुबह कितने बजे उठते हैं यह भी आपके स्वभाव और दैनिक दिनचर्या पर बहुत प्रभाव डालता है। यदि आप देर सुबह तक सोते हैं तो आप दिन भर सुस्त महसूस करोगे साथ ही जो समय कि बर्वादी आपने सुबह लेट उठकर की है उसके लिए आपको सब कार्य जल्दी जल्दी करने होंगे जिससे गलती होने की संभावना बनी रहती है और और आप एक प्रेसर महसूस करते है साथ ही आफिस जाने में भी लेट हो जाते हैं।
              इसके विपरीत आप सुबह जल्दी उठते हैं तो आपको अतरिक्त समय प्राप्त होता है मान लीजिए आप सुबह 8 बजे की जगह सुबह 5 बजे उठते हैं तो आपको 3 घंटे ज्यादा मिलते हैं यदि पूरे साल के घण्टे निकालें तो लगभग 1095 घण्टे और यदि इनको दिन में बदलें तो 45 दिन अर्थात डेढ़ महीना आपको ज्यादा समय मिलेगा आपको अन्य लोगो की तुलना में इस समय का उपयोग कर आप वांछित सफलता प्राप्त कर सकते हैं। जिससे आपको ख़ुशी प्राप्त होगी । आपके स्वस्थ्य की दृष्टी से भी सुबह जल्दी उठना लाभ दायक है क्योंकि सुबह वायुमण्डल में ऑक्सीजन की मात्रा अधिक होती है। यदि आप सुबह जल्दी उठने वालों को देखेंगें तो पायेगें की वो ज्यादा स्वस्थ्य और खुशमिजाज होते हैं।
  • पर्याप्त व्यायाम करें :-  हर रोज व्यायाम करने की आदत विकसित करें । आपने देखा होगा की खिलाड़ी कितने fit और खुश रहते हैं। उसका एक मात्र कारण उनका रोज exercise करना है। यदि आप exercise करते हैं तो दिन भर आप अपने अंदर एक अलग सी स्फूर्ति महसूस करेंगे, आप का confidence lavel अन्य लोगो की तुलना में अधिक रहेगा । इससे से आप अपने अंदर एक ख़ुशी महसूस करेंगे। exercise डिप्रेशन को कम कर खुशमिजाज बनाती है।
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Story with moral in hindi

Story in hindi with moral

आज हम आपके लिए story in hindi with moral पोस्ट के रूप में सर्वश्रेष्ठ story in hindi with moral लेकर आये हैं। ये hindi stories आपको motivate करने के साथ – साथ आप में एक नया नजरिया विकसित करेगी जिससे आप अपने जीवन में आने वाली बाधाओं से मजबूती से संघर्ष कर सकें। सर्वश्रेष्ट कहानियां :-

Contents:-

  1. 11 hindi moral story
  2. 75 story in hindi with moral list 


1. असली विजेता 
Real winner

कई बार आप जीवन में हार जाते हैं और काफी निराश हो जाते है कभी कभी तो लोग बहुत ज्यादा डिप्रेशन में भी चले जाते हैं। आज के इस युग में ज्यादातर यही सिखाया जाता है कि यदि आप जीतते हैं तो ही आपकी value है। हारने वाले व्यक्ति की कोई वैल्यू नही। पर आज इस story in hindi with moral से आप सीखेंगे की असली winner किसे कहा जाता है-

Hindi stories
  1. ओलंपिक में भाग लेना ही एक बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती है । लारेंस लेमिक्स ( Lawrence lemieux) ओलंपिक में नाव की रेस में बुरी तरह से फंस चुके एक प्रतियोगी की सहायता करने के लिए वो रुक जाते हैं। सारी दुनिया देख रही थी कि उन्होंने अपने जितने से ज्यादा एक जिंदगी को बचाने को ज्यादा अहमियत दी। हालांकि वो नोका दौड़ नही जीते फिर भी वो विजेता थे। कई देशों ने उन्हें सम्मानित किया गया।
  2. रुबेन gonzales रेकेटबॉल की विश्व championship के फाइनल मैच में खेल रहे थे। इस फाइनल खेल के मैच पॉइंट पर gonzeles ने एक बेहतरीन शॉट खेला। रैफरी और लाइंसमैन ने शॉट को सही बताते हुए , उन्हें विजेता घोषित कर दिया। थोड़े रुकने और हिचकिचाने के बाद gonzales ने अपने प्रतियोगी को हाथ मिलाते हुए कहा शॉट गलत था । इसका परिणाम ये हुआ कि वे सर्विस हार गए और मैच भी। 
                    हर कोई हैरान था। कोई सोच भी नही सकता था कि कोई इंसान जिसके पक्ष में सब बातें हो और जिसे विजेता भी घोषित कर दिया हो वो इतनी सरलता से हार को गले लगा लेगा। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने ऐंसा क्यों किया तो उन्होंने जवाब दिया की ” मेरे पास अपने जमीर को बचाये रखने के लिए इसके अलावा कोई और रास्ता नही था।” gonzeles मैच जरूर हार गए थे फिर भी वो एक विजेता थे । स्वार्थ के ऊपर ये जमीर की जीत थी।
Moral of story :- हार जीत के इस खेल में नैतिकता सर्वोच्च चीज है। पुराने समय में नैतिकता हमारी शिक्षा और जीवन का अनिवार्य अंग थी। पर आज की आधुनिक शिक्षा में ये विलुप्त सी होती जा रही है। story in hindi with moral यह है कि जीवन को beautiful बनाने के लिए हमारे अंदर नैतिकता का होना जरुरी है।

2.सब विजेता हैं

Every one a winner

Hindi kids story
सब विजेता हैं story in hindi with moral यह story ये बताती है कि कोई कभी हारता नही है अपने स्तर पर सभी एक विजेता होते है।
               एक मैराथन दौड़ में राम , श्याम और रवि ने भाग लिया सैकड़ो लोगो के साथ उन्हीने भी दौड़ना शुरू किया। कोई और बन्दा इस दौड़ को जीत गया। तो इसका क्या ये मतलब है कि राम , श्याम और रवि हार गए? बिल्कुल नही वो हारे नही हैं। उन तीनों ने अलग अलग उद्देश्य से मैराथन दौड़ में भाग लिया था। राम का उद्देश्य था कि वह अपनी क्षमता को अजमाना चाहता था और उसने जितना सोचा था उससे कहीं बेहतर प्रदर्शन किया। श्याम का उद्देश्य था कि वह अपने पिछले प्रदर्शन से बेहतर प्रदर्शन करना चाहता था जो उसने किया। रवि के उद्देश्य था कि वह दौड़ में भाग ले जो उसने पूरा किया। तीनों जिस उद्देश्य से दौड़े उन्होंने उसे पूरा किया वो तीनो भी विजेता थे चाहे उन्हें कोई मैडल नही मिला हो।
Moral of story :-  आप अपनी हार से हताश न हो आप भी कहीं न कहीं एक विजेता हैं। आपके उद्देश्य और मेहनत के अनुसार आप सदैव एक विजेता होते हैं।

3. क्या आपका जीवन बचाने लायक है?
Is your life worth saving

Moral stories for students
यह एक बेस्ट मोरल स्टोरी इन हिंदी short है। एक लड़का नदी में डूब रहा था । वह मदद के लिया जोर जोर से चिल्ला रहा था तभी एक व्यक्ति ने उसे बचाने के लिए नदी के छलाँग लगा दी । कभी मसकत के बाद वह व्यक्ति उस लड़के को किनारे पर ले कर आया। जब व्यक्ति जाने लगा तो उस लड़के ने हाँफते हुए कहा ” मेरी जान बचाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।”  उस आदमी ने लड़के की आँखों में देखते हुए कहा ” बेटा जब तुम बड़े हो जाओ तो इस बात को साबित करना कि तुम्हरी जिंदगी बचाने लायक थी।”
Moral of story :- मोरल ऑफ़ स्टोरी यह है कि आप एक बार अपनी जिंदगी के बारे मे सोचें कि कही आप इसे यूँ ही तो व्यर्थ नही गँवा रहे।

4. मिदास का स्पर्श

The Midas touch

Hindi stories
मिदास का स्पर्श story in hindi with moral । यह story  कहानी बताती है कि कभी कभी हमारी जो इच्छा पूरी होती है । वह भी हमे दुःख पहुंचाती है। यह राजा मिदास की कहानी है जो शायद अपने पहले भी पढ़ी होगी ।
          राजा मिदास को सोने ( Gold) से बहुत ज्यादा लगाव था। एक दिन जब वो सोना गिन रहा था तभी एक अजनबी आता है और राजा को बोलता है ” राजा तुम कोई भी एक वरदान माँग लो जो तुम्हारी इच्छा हो।” ,राजा खुश हो जाता है और वरदान मांगता है कि ” मैं जिस भी वस्तु को छू लू वो सोना बन जाये।” अजनबी ने कहा ठीक है ” मैं तुम्हें ये वरदान देता हूँ कि कल सुबह सूरज की पहली किरण के बाद तुम जो भी वस्तु को छुओगे वह सोना बन जायेगी।” ऐसा कहकर वो अजनबी चला जाता है।
          अगले दिन सुबह राज अपने पलंग को छूता है । पलंग सोने का बन जाता है राजा मिदास को बहुत ख़ुशी होती है। उसने खिड़की से देखा तो पाया कि उसकी नन्ही बच्ची खेल रही है। राजा उस नन्ही बच्ची को अपना ये चमत्कार दिखना चाहत था । राजा अपने कमरे से बहार निकला और ये किताब को पढ़ने के लिए हाथ में लिया तो वो किताब सोने की बन गई। राजा किताब नही पड़ पाया ,  बगीचे में घूमने के लिए गया एक फूल को हाथ लगाया वह भी सोना बन गया। जब राजा भोजन करने बैठा और जैसे ही रोटी को हाथ लगाया वह रोटी भी सोने की बन गई। अब राजा ने अपनी नन्ही सी बिटिया को खिलाने के लिए छुआ तो वह भी सोने की बन गई। यह देखकर राजा के चेहरे की सुर्खियां उड़ गयीं।

            राजा रोने लगा और बोलने लगा कि ” मेरी बेटी मुझ से छीन गई , मैं खा और पी भी नही सकता।” यह वरदान नही ये तो अभिशाप है ये यह सब मेरे लालच के कारण हुआ है।” उसी समय वह अजनबी फिर राजा के पास आता है और राजा से पूछता है कि ” क्या आप मेरे वरदान से खुश हैं? राजा ने रोते हुए कहा ” मैं इस वरदान के कारण दुनिया के सबसे अभागा व्यक्ति बन गया हूँ।” अजनबी ने कहा ” अब बताओ तुम्हे क्या चाहिए अपनी बेटी और भोजन या फिर सोना और सोने की बनी बेटी।” राजा मिदास ने गिड़गिड़ाकर कहा ” मुझे अपनी बेटी और पुराना जीवन ही चाहिए ये सोना और ये जीवन सब मेरे लिए मूल्यहीन हैं।” उस अजनबी ने अपना वरदान बापस ले लिया। राजा को अपनी बेटी बापस मिल गई और एक सबक भी जिसे वि जिंदगी भर नही भूल सका।

Moral of story :- मोरल ऑफ़ स्टोरी यह है कि लालची लोग अपने लालच के कारण मुसीबत में फस जाते हैं।
           

5. एक पिल्ला 

A pappy

Story in hindi for kids

एक बच्चा पालतू जानवर की दुकान में एक पिल्ला खरीदने के लिए गया। वहाँ पर कई सारे पिल्ले बैठे हुए थे। हर एक पिल्ले की कीमत 50 डॉलर थी । एक पिल्ला सबसे अलग एक कोने में बैठा था। बच्चे ने उस पिल्ले की और इशारा करते हुए पूछा कि ” क्या ये पिल्ला बिकाऊ है और ये सबसे अलग क्यों बैठा है? दुकानदार ने जवाब दिया ” यह एक अपाहिज पिल्ला है ये बिकाऊ नही है।”

        बच्चे ने फिर पूछा ” इस पिल्ले को क्या हुआ है और आप अब इसका क्या करोगे? दुकानदार ने कहा ” इस पिल्ले की एक पैर खराब हो गया है इस अब मौत की नींद सुला दिया जायेगा।” बच्चे ने पूछा की क्या वह अभी उस पिल्ले के साथ खेल सकता है । दुकानदार ने कहा ” हाँ तुम खेल सकते है।” बच्चे ने उस पिल्ले को अपनी गोद मे उठाया तो वह पिल्ला उस बच्चे को चाटने लगा।  उस बच्चे ने निर्णय कर लिया की वह इस पिल्ले को खरीदेगा। पर दुकानदार ने कहा ” यह एक अपाहिज पिल्ला है ये बिकाऊ नही है।” पर वः छोटा बच्चा जिद करने लगा तो दुकानदार मन गया।

            उस बच्चे ने दुकानदार को 2 डॉलर दिए बाकि 48 डॉलर लेने के लिए अपने घर की और दौड़ा अभी वह दुकान से बाहर ही निकलने वाला था कि दुकानदार ने चिल्लाकर पूछा ” मुझे समझ नही आ रहा की तुम इतने डॉलर में एक अच्छा पिल्ला खरीद सकते हो फिर भी इस अपाहिज पिल्ले को क्यों खरीदना चाहते हो।”  लड़के ने कुछ जवाब नही दिया बस मुस्कुराया और अपनी पेंट को ऊंचा किया तो उसकी एक टांग में उसने ब्रेस पहन रखी थी उसका भी एक पैर ख़राब था। दुकानदार ने यह देखकर कहा ” मैं अब समझ गया कि तुम इस अपाहिज पिल्ले को ही क्यों खरीदना चाहते हो।”

Moral of story :- मोरल ऑफ़ स्टोरी यह है कि आप किसी व्यक्ति की परेशानी को तभी अच्छे से समझ सकते हैं जब अब भी उसी परेशानी से गुजरें हों।

6. मुझे पता था तुम जरूर आओगे

I knew that you would come

Moral hindi stories
यह एक best moral story in hindi है। बचपन के दो दोस्त थे जो स्कूल , collage यहाँ तक की फ़ौज में भी साथ ही भर्ती हुए। कुछ दिनों बाद युद्ध छिड़ गया दोनों दोस्त एक ही यूनिट से थे। एक रात उन पर हमला हो गया चारो तरफ गोलियाँ वर्ष रही थी। ऐसे समय में ही अँधेरे से आवाज आई  ” हैरी यहाँ आओ मेरी मदद करो।” हैरी ने अपने बचपन के दोस्त बिल ( Bil ) की आवाज तुरंत पहचान ली। हैरी ने अपने कैप्टन से पूछा ” सर क्या मैं बिल की मदद करने के लिए जा सकता हूँ।” कैप्टन ने जवाब दिया ”  मैं तुम्हें जाने की इजाजत नही दे सकता वैसे भी मेरे पास सैनिक कम है मैं तुम्हें खोना नही चाहता वैसे भी आवाज से लग रहा है तुम्हारे दोस्त बिल को बचाया नही जा सकता है।
         हैरी चुप रहा। फिर आवाज आई ” हैरी मेरी मदद करो। हैरी अब भी चुपचाप बैठा रहा क्योंकि उसके कैप्टन ने उसे इजाजत नही दी थी। पर आवाज बार बार आ रही थी । अब हैरी से और नही रहा गया वह कैप्टन से बोला ” कैप्टन कुछ भी हो मुझे जाना ही होगा आखिर वो मेरे बचपन का दोस्त है।”इस बार कैप्टन ने उसे बेमन से जाने की इजाजत दे दी। हैरी रेंगता हुआ गड्ढे में आगे बढ़ा और कुछ देर में बिल को खींचकर बाहर ले आया। कैप्टन ने आकर देखा तो बिल मर चुका था। यह देख कैप्टन गुस्सा में हैरी पर चिल्लाया ” मैंने पहले ही कहा था कि वह नही बचेगा फिर भी तुम ने मेरी बात नही मानी तुम्हारी इस बेवकूफी के कारण में एक और सैनिक के रूप में तुम्हे खो देता।”  हैरी ने जवाब दिया ” कैप्टन मैंने जो किया सही किया जब मैं बिल के पास पहुंचा तो उसके आखरी शब्द थे कि “हैरी मुझे पता था कि तुम जरूर आयोगे।”
Moral of story :- मोरल ऑफ़ स्टोरी यह है कि यदि कोई आप पर विश्वाश करता है तो आपकी भी जिम्मेदारी बनती है कि उस विश्वास को न तोड़ें विश्वास बनाये रखें।

7. मुँह से निकले शब्द बापस नही आते

यह story in hindi with moral है जो एक शिक्षाप्रद कहानी है। एक किसान का अपने पड़ोसी से कुछ बात को लेकर झगड़ा हो जाता है। किसान अपने पड़ोसी को बहुत ज्यादा अपशब्द बोल देता है। कुछ समय बाद किसान को अहसास हुआ कि उसने अपने पडोसी के साथ बुरा व्यवहार किया है। इसका पश्चाताप करने के लिए वह एक पादरी के पास जाता है और पादरी से कहा ” मैंने अपने पड़ोसी को बहुत अपशब्द बोलें है मैं अपनी व्यवहार से दुखी हूँ और इसके लिए क्षमा मांगने आया हूँ। पादरी ने कहा ठीक है ” ये पंख लो और इन्हें शहर के बीचों बीच बिखेर का आजाओ।” किसान ने ऐसा ही किया कुछ समय पश्चात पादरी ने किसान को एक थैला देते हुए कहा ” जाओ और उन सारे पंखों को इस थैले में भर कर ले आओ।” किसान जब शहर के बीचों बीच पहुंचा तो सारे पंख यहाँ वहाँ उड़ चुके थे किसान ने उन्हें इकठ्ठा करने की बहुत कोशिश की पर वह नाकाम रहा । किसान खली थैला लेकर पादरी के पास पहुंचा और कहा ” मैंने बहुत कोशिश की फिर भी सारे पंखों को एकत्रित नही कर पाया।”  पादरी ने कहा ” शब्द भी इन पंखों के समान ही होते हैं एक बार निकल गए तो दुबारा बापस नही आते इसलिए शब्दों को बहुत सोच समझकर बोलना चाहिए।”

Moral of story :- मोरल ऑफ़ स्टोरी यह है कि हमें अपने शब्दों का चयन बहुत सावधानी पूर्वक करना चाहिए। क्योंकि कोई आपके गलत बोले गये शब्दों के लिए आपको माफ़ तो कर सकता है । पर उन शब्दों को कभी नही भूल।सकता।

8. केंकड़े मोरल स्टोरी इन हिंदी

Hindi stories for students
यह एक बहुत ही बेहतरीन story in hindi with moral है। एक बार एक प्रोफेसर अपनी क्लास में कुछ केंकड़े लेकर आया उसने अपनी क्लास के students से कहा कि ” यदि मैं इन सारे केकड़ों को एक कम गहरे बर्तन मे रख दूँ तो क्या ये उस बर्तन से बाहर निकल सकते हैं।”  क्लास के सभी studens ने एक साथ कहा ” हाँ सर ये सभी केंकड़े उस बर्तन से आसानी से बाहर निकल जाएंगे।” प्रोफेसर न कहा ” तुम सब गलत हो ये केंकड़े उस बर्तन से बहार नही निकल पाएंगे।” सभी स्टूडेंट्स ये सुनकर आश्चर्यचकित हो गए , प्रोफेसर ने आगे कहा ” तुम्हें यकीन नही हो रहा शायद चलो प्रैक्टिकल कर के देखते हैं।” ऐसा कहकर प्रोफेसर ने केंकड़ो को एक छोटे से बर्तन में डाल दिया और students से कहा ध्यान से देखो सचमुच एक भी केंकड़े उस बर्तन के बाहर नही आया। students ने कहा ” सर क्या कारण कि एक भी केंकड़ा इस छोटे से बर्तन से बाहर नहीं निकल पाया।” 
          प्रोफेसर ने कहा ” केंकड़े की आदत है कि जब कोई केंकड़ा ऊपर चढ़ता है तो बाकी केंकड़े उसकी टांग खींच कर नीचे ले आते हैं।” यदि आपको जीवन में आगे बढ़ना है तो एक दूसरे की टांग खीचना बन्द करना होगा।
Moral of story :- मोरल ऑफ़ स्टोरी यह है कि हम आप जब तक जीवन में कुछ नही कर सकते जब तक की एक दूसरे की टांग खींचते रहेंगे।

9. मदद

A hindi moral story
यह एक real moral story है। बहुत साल पहले दो लड़के Stanford university में पढ़ रहे थे। एक बार उन्हें पैसों की कमी पड़ी तो उन्होंने सोचा कि क्यों न इगनैसी पैडेरेस्की ( Ignacy  Paderewski) को पियानो बजाने के लिये बुलाया जाये उनके पियानो कार्यक्रम से जो पैसा इकठ्ठा होगा उसे अपनी पढ़ाई और रहने के लिए खर्च कर लेंगे।
             उस समय इगनैसी एक महान पियानों वादक थे।उनके मैनेजर ने 2000 डॉलर की गारन्टी माँगी जो की उस वक्त बहुत ज्यादा रकम थी फिर भी उन दोनों लड़को ने स्वीकार कर लिया। इस संगीत समारोह का बहुत प्रचार किया काफी मेहनत की फिर भी वो लड़के केवल 1600 डॉलर ही जुटा पाये। समारोह के बाद उन लोगो ने अपनी सारी मुसीबत उस महान पियानो वादक इगनैसी को बताई । 1600 डॉलर दिए और बाकि 400 डॉलर का एक करारनामा दिया जिसे वो जल्दी ही जमा कर देंगे। अब उन लड़कों को अपनी collge पढ़ाई का अंत भी दिख रहा था।
               लेकिन इगनैसी ने कहा ” बच्चों ऐसा नही हो सकता।” उन्होंने करारनामा फाड़ दिया और पैसे लौटते हुए कहा ” इस 1600 डॉलर में से अपने सारे खर्च के पैसे निकाल लो फिर जितनी रकम बचती है उसका 10% तुम अपने मेहनताने के तोर पर रखलो, फिर बाकि जो रकम बचेगी उसे मैं ले लूँगा।”
           साल गुजरते गये। पहला विश्व युद्ध हुआ और समाप्त ही गया। इगनैसी पैडरिस्की अब पोलैंड के प्रधानमंत्री बन चुके थे और अपने देश की भूखी जनता के लिए खाना जुटाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। उनकी मदद केवल एक ही व्यक्ति क्र सकता था और वह था US Food and relief Bureau का अधिकारी हर्बर्ट हूवर । हूवर ने बिना देर किये कदम उठाया और हजारों टन अनाज पोलैंड भिजवा दिया।
         इगनैसी पैडरिस्की जब भूंखों की समस्या समाप्त हुई तो हर्बर्ट हूवर को धन्यवाद करने के लिए पेरिस गये । हूवर ने जवाब दिया ” धन्यवाद की कोई जरूरत नही मि., पैडरेसकी! आप को शायद याद नही जब मैं  collage में स्टूडेंट था , और मुश्किल में था , तब आप ने एक बार मेरी मदद की थी।”
Moral of story :-  मोरल ऑफ़ स्टोरी यह है कि यदि आप किसी की मदद करते हैं तो आपके साथ भी अच्छा ही होता है। अच्छाई अपना रास्ता ढूंढ लेती है यह एक बुनियादी नियम है। मदद करते समय फल की इच्छा न रखें । फल तो कुदरती तौर पर आपको मिलेगा ही।

10. भौंरा

Moral hindi kahaniyan
यह एक  अच्छी moral story in hindi है। एक बार philosophy की क्लास के एक प्रोफेसर ने अपनी क्लास के लड़कों से पूछा कि ” बताओ कितने लोगो ने भौंरे को उड़ाते हुए देखा है।” सभी students ने हाथ उठाकर अपनी सहमति प्रदर्शित की कि सभी ने भौंरे को उड़ते हुए देखा है।
             प्रोफेसर ने कहा ” पर तुम को ये पता नही की विज्ञान के नियम अनुसार भौंरा कभी उड़ नही सकता। क्योंकि भौंरे का वजन ज्यादा होता है। किंतु फिर भी भौंरा उड़ जाता है क्योंकि उसे नही पता की विज्ञान उसके बारे में क्या कहता है । वह तो उड़ना चाहता है और इसके लिए कड़ी मेहनत करता है बार बार प्रयास करता है और यह वो जब तक करता रहता है जब तक की वह उड़ नही जाता। भौंरा अपनी लगन और मेहनत से सभी नियमो को गलत साबित कर देता है। मैं आज आपको भौंरा theory के बारे में बता रहा हूँ कि कोई आपके बारे में कुछ भी सोचता है उससे आपके ऊपर कोई भी फर्क नही पड़ता। फर्क तो उससे पड़ता है कि आप अपने बारे में क्या सोचते हैं। जैसा आप सोचते हैं और उसके लिए प्रयास करते हैं। वैसे आप बन जाते हैं जैसे की भौंरा सोचता है कि वो उड़ सकता है और उसके लिए वह प्रयास भी करता है। भौंरा सभी वैज्ञानिक सिध्दांतों को झूठा साबित कर सिद्ध कर देता है और सारी दुनिया को सिखाता है कि सच्ची लगन और कड़ी मेहनत से कुछ भी हासिल किया जा सकता है।”
Moral of story :- मोरल ऑफ़ स्टोरी यह है कि यदि आपके अंदर सच्ची लगन है और उसके लिए आप हार्ड वर्क करते हैं । तो कोई भी असम्भव कार्य को सम्भव कर सकते हैं।

Comfort जोन से बाहर निकलें moral story in hindi

Motivational story in hindi for students

Comfort जोन से बाहर कैसे निकल ? Comfort zone के क्या नुकसान हैं? इस प्रकार के सभी सवालों का जवाब देती है यह moral story in hindi। एक बार एक साधु अपने शिष्य के साथ घूमने के लिए निकले। चलते चलते उन्हें एक जंगल में शाम हो गई। साधु महाराज ने अपने शिष्य से कहा कि ” वत्स शाम हो गई है आज की रात हमें इसी जंगल में गुजारनी होगी। जाकर देखो कहीं कोई आज रात गुजारने की जगह मिल जाये।” शिष्य अपने गुरु की आज्ञा पाकर आश्रय की तलाश करने लगा । तभी उसे एक झोपड़ी  दिखाई दी । शिष्य अपने गुरु को लेकर उस झोपडी में पँहुचा। दरवाजा खटखटाया तो एक व्यक्ति उस झोपडी से बहार आया। जैसे ही उसने देखा कि एक साधु महाराज उसके घर के सामने खड़े हैं। उसने शीघ्रता से साधु के चरण छूते हुए कहा ” आज तो मेरे भाग्य ही खुल गए जो आप मुझ गरीब के यहाँ पधारे।”

           साधु ने उस व्यक्ति को आशीर्वाद देते हुए कहा ” बेटा क्या हमको आज रात गुजारने के लिए यहाँ थोड़ी सी जगह मिल सकती है। सुबह होते ही हम यहाँ से चले जायेंगे।” व्यक्ति ने प्रसन्न होकर कहा ” महाराज आप इसे अपना ही घर समझें।”  उस व्यक्ति ने साधु महाराज का बहुत स्वागत किया अच्छा भोजन करवाया। साधु महाराज ने कहा ” बेटा मैं तुम्हारे इस अतिथि सत्कार से बहुत प्रसन्न हुआ।” साधु ने आगे कहा ” बेटा तुम इस वीरान जंगल में कैसे जीवन निर्वाह करते हो।”  उस व्यक्ति ने कहा ” महाराज मेरे पास एक भैंस है बस उसके ही दूध से जीवन निर्वाह होता है। जो मेरे पास जमीन है उसमें भैंसे के लिए चारा उगाता हूँ। मैं और मेरा परिवार इससे बहुत खुश हूँ।” साधु ने कहा ठीक है अब हम आराम करते है तुम भी सो जाओ। जब वह व्यक्ति और उसका पूरा परिवार गहन निंद्रा मे सो गया तो साधु ने अपने शिष्य से कहा चलो अब यहाँ से चलते हैं। एक काम करो ये जो जड़ी मैं तुम को देता हूँ । उसे तुम भैंस को खिला दो शिष्य ने वैसा ही किया जड़ी बूटी भैंस को खिला दी।

           जब वो लोग जंगल से बाहर निकले तो शिष्य ने साधु से पूछा कि आखिर वो जड़ी बूटी किस कार्य के लिए थी और भैंस को क्यों खिलाई? साधु ने कहा  ” वह जड़ी जहर का कार्य करती है। उसको खा कर भैंस मर जायेगी।” यह सुनकर शिष्य गुस्सा करते हुए अपने गुरु से बोला ” उसने हमारा इतना सत्कार किया और अपने उसकी आजीविका उस भैंस को मार दिया। आप बहुत ही निर्दयी हो।” साधु ने कुछ जवाब नही दिया।

         बहुत वर्ष बीत गए एक दिन साधु ने अपने उसी शिष्य से कहा “चला आज हम उस व्यक्ति के पास चलते हैं । जिसकी भैंस को हमने मार दिया था।” शिष्य ने जवाब दिया ” हमने उसकी आजीविका को खत्म कर दिया था। मेरे हिसाब से शायद अब वो जीवित भी नही होगा।” फिर भी चलकर देखते हैं कि उसका क्या हुआ। जब साधु और उसका शिष्य उसी जगह पर पहुँचते हैं तो देखते हैं कि अब झोपडी की जगह ये बहुत ही सुंदर घर बना हुआ था चारों तरफ फसल लहरा रही थी। जब इन दोनों ने दरवाजा घटघटाया तो वही व्यक्ति बाहर निकाल उसने साधु को देखते ही उनके चरणों में गिर गया। शिष्य को बहुत आश्चर्य हो रहा था उसने पूछा ” पहले ये बताओ कि तुमने इतनी तरक्की कैसें कर ली।” उस व्यक्ति ने कहा ” ये तो सब इन साधु महाराज की कृपा है । जिस दिन आप हमारे घर से गये थे उसी दिन हमारी भैंस मर गई। हमारे पास जीविका का कोई साधन नही था इसलिए हमने हमारे खेतों को साफ कर उनमें फसल बोना शुरू कर दिया। और उससे बहुत आमदनी हुई।” शिष्य को अभी भी कुछ समझ नही आ रहा था।

         साधु ने अपने शिष्य को असमंजस में पड़े देख कहा मैं समझाता हूँ ” यदि इस व्यक्ति की भैंस न मरी होती तो यह अब भी उस भैंस को ही चरा रहा होता। और इसके खेतों में फसल की जगह चारा होता। यह अपनी भैंस के अलावा कुछ नही सोचता था वह भैंसे ही इसकी प्रगति में बाधक थी। इसलिए हमने उस भैंस को मार दिया। जिसके परिणाम तुम देख ही रहे हो।”

Moral of story :- मोरल ऑफ़ स्टोरी यह है कि आपके जीवन में comfort zone ही वह भैंस है जो तुम्हें आगे बढ़ने से रोक रही है। यदि जीवन में कुछ अलग कर के दिखाना है तो comfort zone रूपी इस भैंस को मारना ही होगा।

सर्वश्रेष्ट कहानियां in hindi with moral

यहाँ in hindi story with moral  की लिस्ट दे रहें हैं। किसी भी स्टोरी पर click कर आप best story in hindi with moral पढ़ सकतें है। inhindistory. com की सर्वश्रेष्ट कहानियों का संग्रह निम्नानुसार है :-
  1. कोरा ज्ञान एक  story in hindi with moral
  2. खड़े रहें story in hindi with moral
  3. एक बार फिर खरगोश और कछुआ रेस story in hindi with moral
  4. Focus only one story in hindi with moral
  5. Help story in hindi with moral
  6. आत्मविश्वाश story in hindi with moral
  7. जिद्द story in hindi with moral
  8. Swami vivekanand story in hindi
  9. Swami vivekanand dhyan ki shakti story in hindi
  10. जीत आपकी होगी story in hindi with moral
  11. सेठ और भिखारी story in hindi with moral
  12. बैताल पचीसी story in hindi with moral
  13. पाप किसको लगा बैताल पचीसी story in hindi with moral
  14. पत्नी किसकी बैताल पचीसी story in hindi with moral
  15. बैताल पचीसी तीसरी story in hindi
  16. सोच story in hindi with moral
  17. धक्का story in hindi with moral
  18. पाँच बातें story in hindi with moral
  19. Hindi story with moral
  20. लुई पास्चर story in hindi
  21. सफलता का रहस्य story in hindi with moral
  22. Arjun a moral story for kids
  23. रटो नही समझो story in hindi with moral
  24. उड़ान story in hindi with moral
  25. Sheikh chilli story in hindi with moral
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  27. Paras patther story in hindi with moral
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  29. जीवन बदल देने वाली कहानियां stories in hindi with moral
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  55. चतुर कौआ hindi moral story for kids
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  57. अस्पताल की खिड़की story in hindi with moral
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  60. मासूम बकरी story in hindi with moral
  61. सतर्क रहें story in hindi with moral
  62. स्वयं की मदद करें story in hindi for students
  63. तानसेन hindi story
  64. दुष्टों पर विश्वास न करें story in hindi for moral
  65. खुद को मजबूत स्थिति मे रखें story in hindi with moral
  66. You are unique story in hindi with moral
  67. हार न मानें story in hindi with moral
  68. अपने आप पर विश्वास रखें 
  69. Apni galtiyon se sikhen story in hindi with moral
  70. Prathmiktaon ka nirdharan krein story in hindi with moral
  71. Safalta ka rahsya hindi story for students
  72. Kisi ko kabhi kam n ankhein hindi story with moral
  73. Sach bolo in hindi story with moral
  74. Sabak a moral hindi story
  75. Jivan me lakshya ka nirdharan kaise krein motivational hindi article

jivan me lakshya ka mahatva

IMPORTANCE OF GOAL IN HINDIलक्ष्य का महत्व

 
 
jivan me lakshya ka mahatva बहुत अधिक होता  है। मान लीजिए आप एक रेलवे से स्टेशन पर खड़े हुए हैं। पर आपको मालूम नही है कि आपको कहाँ जाना है। तो सोचिये क्या होगा । ऐसी परिस्थिति में दो बातें हो सकती हैं पहली आप कहीं नही जाओगे railway station पर ही रहोगे दूसरी आप कहीं पर भी पहुँच जाओगे जो अपने पहले से तय नही किया। सम्भवतः ये दोनों ही स्थिति खराब हैं। इसलिए यदि हम सच में कोई सफलता हासिल करनी है या जीवन कुछ करना है । तो आप के पास एक स्पष्ट लक्ष्य होना अति आवश्यक है। जैसे रोटी बनाने के लिए आटा मुख्य आवश्यक वस्तु है । वैसे ही जीवन को निखारने और सवारने के लिए जीवन में एक स्पष्ट लक्ष्य हों जरुरी है।


Lakshya ka mahtv in hindi

 

          
“जीवन के रास्तों पर चलते हुए अपनी आँख अपने लक्ष्य पर टिकायें रखें। आम पर ध्यान दें गुठली पर नही।”
 
 
        ज्ञान आपको आपकी मंजिल तक निश्यचित ही पहुंचा देगा बशर्ते आपको अपनी मंजिल मालूम होनी चाहिए।
 
 
 
 
 

अपनी नजर लक्ष्य पर रखें

 
कुछ भी हो आपकी नजर हमेशा आपके लक्ष्य पर होनी चाहिए। यदि आप मुशीबतों पर ध्यान दोगे तो लक्ष्य नजर नही आयेगा और यदि आप लक्ष्य पर ध्यान दोगे तो मुसीबतें नजर नही आयेगी।
 
               1 जुलाई 1952 को फ्लोरेन्स चैडविक , कैटालिना चैनल ( catalina channel) पार करने वाली पहली महिला बनने वाली थी। English channel को वो पहले ही पार कर चुकी थी। सारी दुनिया की निगाहें उन पर टिकी थी। उन्होंने हड्डियों को कांपकपाने वाली ठंड और घने कोहरे में कई बार मछलियों को भी मात दी थी। वह किनारे पर पहुँचने का काफी प्रयास कर रही थी। पर वो जब भी दिखती चश्में में सिर्फ कोहरा ही दिखता । किनारा न दिखने के कारण फ्लोरेंस चैडविक ने हार मान ली। चैडविक को सदमा ये बात जानकर लगा कि वो किनारे से मात्र आधे मील ही दूर थीं। उन्होंने बाधाओं से घबरा कर हार नही मानी थी, उन्होंने हर इसलिए मानी कि उनको अपना लक्ष्य (किनारा) दिखाई देना बंद हो गया था। उन्होंने कहा भी ” मैं बहाने नही बना रही हूँ। यदि मैंने किनारा देखा होता तो , मैं जरूर कामयाब हो जाती।”
 
          वो दो महीने बार फिर बापिस गईं । उन्होंने ख़राब मौसम के बाबजूद भी लक्ष्य पर ध्यान रखा और कैटलीना चैनल को पुरुषों का रिकॉर्ड 2 घंटे से तोड़कर पार कर लिया।
 
          दोस्तों यदि आपका ध्यान आपके लक्ष्य से थोड़ा भी विचलित हुआ तो आप सफलता से कोशों दूर हो जाओगे। अतः आपकी नजरें हमेशा लक्ष्य पर होनी चाहिए।
 
 
 
 

लक्ष्य क्यों जरूरी है?

Why are goals importance?

 
 
 
तेज धूप में भी मैग्निफाइंग ग्लास से कागज में आग जब तक नही लगती जब तक की मैग्निफाइंग ग्लास को कागज के ऊपर स्थिर (FOCUS)  न रखा जावें। focus की शक्ति से कागज आग पकड़ लेता है वैसे ही जीवन में आप जब ही किसी वस्तु पर focus कर पयोगे जब आपके पास एक निश्यचित लक्ष्य हो।
 
            
         एक बार एक यात्री सड़क पर रुका और उसने एक बुजुर्ग से पूछा कि ” यह सड़क मुझे कहाँ ले जाएगी? बुजुर्ग ने पूछा ” तुम्हें कहाँ जाना है ।” यात्री बोला ” मुझे नही मालूम? 
तो बुजुर्ग ने मुसुकुरा कर कहा ” कोई भी सड़क पकड़ लो क्या फर्क पड़ता है।”
 
         मान लीजिए कि आपकी फुटबाल टीम मैच खेलने के लिए तैयार है और अचानक goal post और goal लाइन को हटा दे । तब खेल का क्या होगा? आप स्कोर कैसे पता करेंगे ? आप कैसे जानोगे कि आप लक्ष्य तक पहुँच गये हैं? बिना दिशा के उत्साह उस जंगल की आग की तरह है जिससे मायूसी ही मिलती है । लक्ष्य ही होता है जो अहसास कराता है कि आप सही दिशा में जा रहा हैं।
 
 
 
 

सपने और लक्ष्य में अंतर
Diffirence between dreams and goal

 
 
अक्सर लोग सपने या इच्छा को लक्ष्य समझते हैं। सपने और इच्छाएं सिर्फ चाहत हैं। चाहतें  कमजोर होती है । निम्न बातें लक्ष्य को चाहतों से अलग करती हैं :-
 
  1. दिशा (direction)
  2. समर्पण ( Dedication)
  3. दृढ़निश्चय ( Determination)
  4. अनुशासन ( Discipline)
  5. समय सीमा (Deadline)
 
        सपने और लक्ष्य में इन पाँच D (  direction , dedication , determination , discipline , deadline) का अंतर होता है।
 
 
 

सपनों को हक़ीक़त कैसे बनायें

 
यदि आप अपने सपनों को हकीकत में बदलना चाहतें हैं तो निम्न कार्य करें :-
  1. एक कागज पर अपना स्पष्ट लक्ष्य लिखें ।
  2. लक्ष्य प्राप्त करने के लिए कार्य योजना बनाएं।
  3. उपरोक्त बातों को रोज दो बार पढ़े।

ज्यादातर लोग अपना लक्ष्य क्यों नही बनाते?

Why don’t more people set goals ?

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि ज्यादातर लोग अपना कोई लक्ष्य ही निर्धारित नही करते हैं। इसके निम्न कारण  हैं :-
  • निराशावादी नजरिया ( pessimistic) :- ज्यादातर लोगो का नजरिया निराशावादी होता है वो सम्भावनाओ के बारे में न सोचकर कठिनाइयों के बारे में सोचते है। इसलिए वो अपना कोई लक्ष्य निर्धारित नही कर पाते हैं।
  • अभिलाषा की कमी ( lack of ambition) :- यह जीवन मूल्यों के साथ साथ भरपूर जिंदगी जीने की इच्छा के आभाव का परिणाम होती है। हमारी सिमित सोच हमें आगे बढ़ने से रोकती है। एक मछुआरा था जो जब भी कोई बड़ी मछली पकड़ता उसे पानी में पुनः फेंक देता। ऐसी अजीब हरकत को देखकर किसी ने उससे पूछा कि वो ऐसा क्यों कर रहा है? तो मछुआरे ने जवाब दिया ” मेरी कड़ाई छोटी है।” अधिकतर लोग जीवन में इसलिये सफलता प्राप्त नही कर पाते क्यों कि वो छोटी कड़ाई ले कर घुमते रहते हैं।
  • असफलता का डर ( fear of failure) :-  अधिकतर लोग असफलता से डरते है । वो सोचते हैं कि यदि में fail हो गया तो क्या होगा? लोग क्या सोचेंगे मेरे बारे में? लोग क्या कहेंगे ? उनके अवचेतन मन में ये चलता रहता है कि यदि लक्ष्य ही निर्धारित नही करेंगे तो असफल भी नही होंगे। पर वो लोग ये नही समझते कि यदि उनके पास कोई लक्ष्य नही है तो वो वैसे भी असफल ही हैं।
  • टालमटोल  ( procrastination) :-  अभी तो काफी समय है आराम से कर लेंगे लक्ष्य का निर्धारण इस सोच के कारण भी लक्ष्य निर्धारण में बाधा आती है। यह सोच महत्वकांक्षा में कमी का नतीजा है।
  • सफलता का आतंक ( fear of success) :-  खुद को दूसरों से कम आँकना  या सफल जिंदगी को लेकर पाली गई आशंकाओं के कारण भी व्यक्ति में सफलता का आतंक पैदा हो जाता है।
  • स्वप्रेरणा की कमी ( lack of self motivation) :-  व्यक्ति के अंदर आंतरिक प्रेरणा के आभाव के करना भी वह कोई लक्ष्य निर्धारित नही करता है।
  • लक्ष्य का महत्व न समझना :- उन लोगो को किसी ने कभी लक्ष्य के बारे में सिखाया नही और उन्होंने कभी लक्ष्य का महत्व समझ नही।
  • लक्ष्य तय न करने का कोई तरीका न जानना ( lack of knowledge about goal setting) :-  लोग लक्ष्य तय करने का कोई तरीका नही जानते उन्हें हर कदम पर गाइड की जरुरत पड़ती है जो उन्हें बाधाओं को पार करने मे मदद कर सके।

अपना लक्ष्य कैसे निर्धारित करें ?

How to set your goal?

लक्ष्य निर्धारित करने के लिए क्रमबद्ध कदम उठाने होते हैं जब आप किसी ट्रैन का टिकट खरीदते हैं तो उसमें क्या लिखा होता है ?

  • यात्रा करने का स्थान ( starting point)
  • कीमत ( price)
  • गन्तव्य स्थान ( destination point)
  • श्रेणी ( class of travel)
  • टिकिट समाप्ति तिथि ( ticket ending date)
अगर कोई आपसे आपकी जिंदगी के कोई बड़ा मकसद पूछे तो आप शायद कहेंगे कि आपको जिंदगी में सफल होना है , खुश रहना है , एक बेहतर जीवन व्यतीत करना है। आपका ये जवाब अस्पष्ट है ये आपकी चाहत है लक्ष्य नही । लक्ष्य SMART होना चाहिए । SMART का अर्थ है :-

  1. S फॉर Specific ( स्पष्ट) :- यदि आप कहते हैं कि ‘ मैं वजन घटाना चाहता हूँ।” ये अस्पष्ट है लक्ष्य नही हो सकता ये मात्र आपकी इच्छा है। यह लक्ष्य तब बनता है जब आप निश्यचित कर लेते हैं कि ” मैं 100 दिन में 10kg वजन कम करूँगा।”
  2. M फॉर measurable ( मापे जाने योग्य) :- लक्ष्य ऐसा होना चाहिए जिसे मापा जा सके। यदि लक्ष्य को मापा नही जा सकता तो लक्ष्य को हासिल भी नही किया जा सकता। यही वह रास्ता है जिससे अपनी तरक्की पर नजर रख सकते हैं।
  3. A फॉर Achievable ( हासिल किये जाने योग्य) :- इसका मतलब है कि लक्ष्य मुश्किल और कठिन तो हो पर वह नामुमकिन नही होना चाहिए क्योंकि असम्भव लक्ष्य निराश ही करता है।
  4. R फॉर Realistic ( वास्तविक) :-  लक्ष्य मात्र काल्पनिक नही होना चाहिए जैसे ” मैं 30 दिन में 40 kg वजन कम करूँगा।”
  5. T फॉर Time bounded ( समयबद्ध) :- कार्य के सुरु और अंत की भी एक समय सीमा होना चाहिये।
      आपको अपना लक्ष्य निर्धारित कर समय उपरोक्त बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए। सफलता के लिए एक स्पष्ट लक्ष्य का होना बहुत जरुरी है बिना लक्ष्य के सफलता पाना वैसे ही है जैसे अँधेरे में तीर चलाना।
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